Tuesday, 4 June 2024

 नीतीश कुमार होने की महत्ता


कोई भी व्यक्ति जिसे लगता हो कि उसकी प्रासंगिकता कम हो गई है या खत्म हो रही है उसे बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को देखना चाहिए। पिछले कुछ सालों में नीतीश कुमार को लेकर बहुत सी बातें हुई जैसे उनका और उनकी पार्टी का स्वतंत्र रुप से कोई अस्तित्व नहीं है, ज़मीन पर उनका और उनकी पार्टी का कोई कैडर नहीं है और वो संयोगवश केवल पलटी मार मार के मुख्यमंत्री बने रहे हैं। वो ऐसे खिलाड़ी है जो किसी ना किसी के कंधे पर बैठ कर बड़े बनते हैं उनका खुद का कद कोई बहुत बड़ा नहीं है। 

इंडिया गठबंधन के लिए पहल करने वाले नीतीश कुमार, अलग अलग पार्टियों के साथ संयोजन बैठाने वाले नीतीश कुमार, लालू यादव के साथ भाईचारा निभाने वाले नीतीश कुमार, लोकसभा चुनाव से ठीक पहले पाला बदल कर एनडीए में मिल गए। पूरे देश में किरकिरी हुई और पलटी कुमार के नाम से मशहूर हुए। बिहार एक बार फिर राजनीतिक सरगर्मियों के कारण सुर्खियों में आ गया था और नीतीश कुमार पूरे देश के लिए मज़ाक का पात्र बन गए थे इसके साथ साथ पूरे देश में बिहार को लेकर भी कुछ ऐसा ही माहौल था कि इस राज्य का कुछ नहीं हो सकता। 

वो नीतीश कुमार जो इस बात का श्रेय लेते हैं कि उनके कारण ही बिहार की जो जंगलराज की छवि थी उसमें बदलाव हुआ, पूरे देश में बिहारियों को जो गाली पड़ती थी उसमें सुधार हुआ और बिहार सुशासन के पथ पर आगे बढ़ा, वो नीतीश कुमार जो देश के लिए पीएम मैटेरियल चल रहे थे अचानक उनके बारे में ये बात होने लगी कि उनकी पार्टी का चुनाव के बाद भाजपा या राजद में विलय हो जाएगा, एक तरह से नीतीश और उनकी पार्टी जद यू के अस्तित्व पर ही सवाल खड़ा गया था। 

चुनाव के दौरान पटना में चल रहे प्रधानमंत्री मोदी के रोड शो के दौरान हाथ में कमल का निशान लिए नीतीश कुमार की तस्वीर काफी वायरल हुई जिसमें नीतीश का कद काफी छोटा लग रहा था और चेहरे की चमक भी गायब थी। किसी भी व्यक्ति के आत्मसम्मान को चोट पहुंचाने वाली तस्वीर थी वह जहां एक समय पीएम पद के दावेदार चल रहे नीतीश कुमार पीएम के सामने बहुत छोटे दिखाई पड़ रहे होते हैं। 




आज चुनाव के नतीजों के बाद कोई सबसे ज्यादा प्रासंगिक बन गया है तो वो फिर से नीतीश कुमार ही हैं। भाजपा को अकेले पूर्ण बहुमत नहीं मिला है और एनडीए साथ दो सबसे बड़े दल नीतीश की जद यू और चन्द्राबाबू नायडू की टीडीपी है। ये दोनों दल पहले इंडिया गठबंधन का हिस्सा थे और अब की स्थिति में इनकी उपस्थिति सरकार बनाने के लिए बहुत जरूरी है। 

नीतीश फिर से किंगमेकर बन कर उभरे हैं और इनकी मांग पूरी करना एनडीए और इंडिया दोनों के लिए मजबूरी है। नीतीश कुमार फिर से जो चाहें इनसे मनवा सकते हैं और सबसे छोटा दल होने के बावजूद जैसे वो बिहार में इतने सालों से पाला बदल बदल कर मुख्यमंत्री रहे हैं आगे और भी महत्वपूर्ण पद पर बैठ सकते हैं।




नीतीश कुमार को देख कर लगता है कि वक्त कभी भी किसी का भी बदल सकता है बस टिके रहने की जरूरत होती है। 




Friday, 3 November 2023

                                    अथ श्री मसाला फिल्म कथा 




कुछ दिनों से मैं खुद को कुछ ज़्यादा ही गंभीर, विवेकी, बुद्धिजीवी टाइप से समझ रहा था, लग रहा था कि मेरी पसंद थोडी अलग है, सामान्य चीजें और बाज़ारवाद मुझे आकर्षित नहीं करते और सिनेमा के मामले में तो मेरी पसंद बिलकुल ही जुदा हो गई है और भारी भरकम फिल्में मुझे ज़्यादा पसंद आ रही हैं जिसका जिक्र लोगों के बीच कम हो रहा है ऐसे सिनेमा का नाम लेकर जैसे "काफ़िर की नमाज़, एक रूका हुआ फैसला, सलीम लंगड़े पे मत रो, मंटो " मैं लोगों के बीच कुछ अलग सा ही लगता हूँ। मैं सामान्य से खुद को अलग मान कर एक अलग ही जोन में खुश चल रहा था। 


फिर एक रात मुझे एहसास हुआ कि ऐसा भी क्या हो गया है मुझे आखिर क्यों मसाला फिल्में मुझे पसंद नहीं आ सकती, क्यों मैं गदर टू में सन्नी देओल को फिर से हैंडपैंप उखाड़ते देख चिल्ला नहीं सकता, क्यों मैं पठान में सलमान खान की इंट्री पर सीट पर चढ़ के नाच नहीं सकता, क्यों मुझे जवान फिल्म के करोड़ों की कमाई भी सिनेमाघर के तरफ खींच नहीं सकती।


ऐसे में मैं अचानक नींद से जागा "गैंग्स ऑफ वासेपुर" को याद कर के खुद को कोड़े मारे और आधी रात को "पठान" लगा कर देखने बैठा कि शुरुआत यही से की जाए और देश के आम दर्शकों के साथ कदम से कदम मिला कर चला जाए, और खुद से खुद को दिया हुआ आउटडेटेड/ इंटेलेक्चुअल का अवार्ड खुद को वापस कर दिया जाए।


भाई साहब मैं बता रहा हूँ मैं कोई दुनिया से अलग तो नहीं हूँ लेकिन इतना धैर्यवान भी नहीं हूँ, मुझे और धैर्य की आवश्यकता है कि मैं इस फ़िल्म को पूरा कर सकूँ, फिल्म के संवाद मुझे धांय धांय एक्शन दृश्य में चल रहे गोलियों के तरह लग रहे थे, मैं फ़िल्म के साथ तालमेल नहीं बैठा पा रहा था, मैं सोच रहा था कि बंद कर दूँ फिर सोच रहा था कि क्यों फिल्में ऐसी ही तो होती हैं, फिल्में ऐसी ही तो होनी चाहिए फिर मेरे साथ ऐसा क्यों हो रहा है, ऐसा क्या हो गया है मुझे, बीच में उठ के मैंने पानी पीया, खुद को कोसा और अपने धैर्य की परीक्षा उत्तीर्ण करने की कोशिश में फिल्म को पूरा किया। 


इस हादसे के बाद फिर से वासेपुर के तर्ज पर खुद को कोडे मारे और खुद को इसकी सजा दी, अब मैं गदर टू और जवान देखने की हिम्मत जुटा रहा हूँ ताकि आम दर्शकों की भीड़ में शामिल हो सकूँ, अगले किस्त में किसी और मसाला फिल्म की कहानी लेकर आऊंगा, मेरे लिए दुआ कीजिएगा। 


धन्यवाद

Thursday, 12 October 2023

           सोशल मीडिया बनता जा रहा है सॉफ्ट पॉर्न का अड्डा

एक बड़ी संख्या में देश की जनता को लग रहा है कि सारे लाइक्स और फौलोवर नंगई से ही आ रहे हैं, और कहीं ना कहीं उनकी ये सोच ठीक भी है, क्योंकि लगभग लोग ऐसे सफलता पा भी रहे हैं, और बात ये ठीक भी है कि इंसान तो नंगा पैदा होता है तो नंगई में शर्म कैसी, इंसान नंगा ही पैदा होता है, कपड़े इंसानों ने बनाया है वरना नंगा होना इज नैचुरल।


अब सबसे जरूरी है पैसा, पहले सोशल मीडिया प्रोफ़ाइल, फिर फोलोवर, लाइक्स की संख्या में बढोतरी और फिर इंन्फ्लुएंसर का तमगा और फिर कमाई और वो चाहे जैसे हो। कुछ लोग अपने कन्टेंट से भी कमा रहे हैं लेकिन उनकी संख्या बहुत कम और उसमें मेहनत ज़्यादा है, अब मेहनत ही करना होता तो पढाई लिखाई करते, यूपीएससी की तैयारी करते फिर सोशल मीडिया पर क्या कर रहे हैं। 


जीवन का सिद्धांत है कम मेहनत और कम समय में ज़्यादा कमाई, लीक से हट कर कुछ करना जिसे लोग पसंद करें, और सबसे आसान और लीक से हट कर यही है, अब ये अलग बात है ज़्यादातर लोग इसी तरीके से लीक से हट रहे हैं।


दिक़्क़त उनके साथ है जो ना अभी तक नंगई के प्रति सहज नहीं हुए हैं, अब वो सेमी नंगई के साथ कोशिश तो कर रहे हैं लेकिन अभी सामाजिक बंधनों से मुक्त नहीं हुए हैं इस वजह से कमाई से अब तक दूर हैं और पारंपरिक तरीके से नौकरी कर के जीवन चला रहे हैं और कसक ये है कि यार इतने आसान तरीके से जब कमा सकते हैं तो ये कोई ये पारंपरिक तरीका क्यों ले, वो क्यों ना ले। 


परंपरा, प्रतिष्ठा, अनुशासन ये सब पुरानी बातें हो गई, देश का बहुत बड़ा वर्ग है जो पढाई लिखाई से वंचित रहा है, रोज़गार से दूर है, उनके लिए अगर ये कमाई का जरिया है तो ठीक ही है बाकी हमारे जज करने से उनका जीवन तो चलेगा नहीं।

सबसे ज़्यादा संख्या में हमारे यहां पॉर्न देखा जाता है और अब सोशल मीडिया के माध्यम से लोगों तक ये सॉफ्ट पॉर्न के रूप में पहुंच रहा है तो क्या ही दिक़्क़त है, और ये बनाने वाले कहीं बाहर के नहीं हैं आस पास के हैं और बच्चों से बूढों तक इसकी पहुंच आसानी से हो रही है। 


एक हमारी तरह के भी लोग हैं जो ये सब लिखने के अलावा कुछ कर नहीं सकते हैं तो लिख रहे हैं, इसे जिस रूप में लेना है लिया जाए बाकी तो "मेरा देश बदल रहा है और कम से कम इस मामले में तो बहुत तेजी से आगे बढ रहा है।"

 

विकास की राह ताकते किशनगंज के पंचायत, कहां है विकास ?

देश के सबसे पिछड़े राज्यों में से एक बिहार और बिहार का सबसे पिछड़ा इलाका सीमांचल। बिहार के सबसे उत्तर-पूर्वी छोर पर बसा सीमांचल का जिला किशनगंज जो एक तरफ बंगाल से जुड़ा हुआ है तो दूसरी तरफ नेपाल से। किशनगंज जिले में कुछ गांव तो ऐसे हैं जो बंगाल से ज्यादा जुड़े हुए हैं और बिहार से कम। बिहार की बदहाली का आलम अगर आप जानते हैं तो सोचिए बिहार का सबसे पिछड़ा इलाका भला कितना बदहाल होगा।

बिहार का परिसीमन इस प्रकार का है कि किशनगंज जिला और लोकसभा क्षेत्र का गणित समझने के लिए आपको पेन और पेपर लेकर बैठना होगा। किशनगंज लोकसभा क्षेत्र में 6 विधानसभा क्षेत्र हैं किशनगंज, कोचाधामन, बहादुरगंज, ठाकुरगंज, बैसी और आमौर। अब बैसी और अमौर किशनगंज जिले का नहीं पूर्णिया का हिस्सा हैं। किशनगंज जिले में इनमें 4 विधानसभा क्षेत्र हैं किशनगंज, कोचाधामन, बहादुरगंज और ठाकुरगंज। किशनगंज जिले में सात प्रखंड हैं, किशनगंज विधानसभा में दो किशनगंज और पोठिया, कोचाधामन में एक कोचधामन, बहादुरगंज में बहादुरगंज और टेढ़ागाछ और ठाकुरगंज में ठाकुरगंज और दिघ्घलबैंक। अब परिसीमन का ऐसा आलम है कि किशनगंज प्रखंड के 6 पंचायत कोचाधामन विधानसभा क्षेत्र में हैं।

विकास का यहां ऐसा आलम है वो कहां है खोजने से भी नहीं मिलेगा। सरकार की तमाम योजनाएं यहां आते आते दम तोड़ देती हैं। किशनगंज प्रखंड का पंचायत पिछला, वार्ड नंबर 15, ये महादलित की बस्ती है और इस वार्ड में एक भी शौचालय नहीं है। बरसात के दिनों में यहां इतना पानी भर जाता है कि गर्दन तक पानी पार कर के आप अपने घर में जाना संभव हो पाता है। यहां के वार्ड सदस्य की मानें तो पेड़ पर रहने के नौबत आ जाती है। बरसात में यहां रहने वाले लोग बांस को जोड़ कर ऊंचा कर घर बनाते हैं या रोड पर रहने चले जाते हैं। यहां एक भी घर में उज्ज्वला योजना के तहत गैस नहीं मिला है। ये अभी भी लकड़ी पर खाना बनाते हैं लेकिन आप इनसे जाएं तो चाय जरूर पिलाते हैं। ये इतने अभाव में हैं कि कोई नेता इनसे झूठे वादे कर के वोट ले सकता है। पिछले कई सालों से ये यहीं पर हैं लेकिन विकास से अनंत काल की दूरी पर हैं। ये जीवन के मूलभूत सुविधाओं से ही वंचित हैं तो शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क तक तो बात भी नहीं पहुंचती। बिजली ज़रूर यहां पहुंची है वरना ये अंधेरे में रहने को विवश रहते क्योंकि किरोसिन तो अब कहीं मिलता नहीं।


ऐसे ही किशनगंज प्रखंड में ही है पंचायत दौला जिसका वार्ड नंबर 14 पूरा का पूरा कट कर महानंदा में समा गया। इसके निवासी पिछले चार साल के रोड के दोनों किनारे झोपड़ी बना कर रह रहे हैं, इनके लिए जैसे सरकार सो रही है। इसी बीच लोकसभा और विधानसभा के चुनाव भी हुए लेकिन इनकी स्थिति में कोई परिवर्तन नहीं आया। लोगों की जमीने महानंदा में समा गई वो बेघर भी हुए और बिना जमीन वाले भी लेकिन सुनने वाला कोई नहीं। एक बुजुर्ग महानंदा की तरफ दिखाते हुए कहते हैं वो दूर मेरा घर था महानंदा ने सब ले लिया। अब मजदूरी कर के जी रहे हैं। इसी प्रखंड में एक पंचायत है पिछला जो अपने नाम के अनुरूप किशनगंज का सबसे पिछड़ा पंचायत है। यहां कुछ लोगों को उज्ज्वला गैस का कनेक्शन तो मिला है लेकिन उसे भराने के लिए कोई सुविधा नहीं क्योंकि किशनगंज जाकर गैस भरा कर लाना एक दिन की मजदूरी का नुकसान करना है। बंगाल पास होने से ब्लैक में गैस तो मिल जाएगा लेकिन उसके लिए 3000 रुपए खर्च करना समान्य परिवार के लिए लगभग असंभव ही है।  

किसी भी पंचायत में आप जाएं आपको सन्नाटे के सिवा कुछ नहीं मिलेगा क्योंकि आधी से ज्यादा आबादी रोजगार के लिए बिहार से बाहर है। यहां काम धंधे का कोई उपाय नहीं और पेट पालने के लिए पैसा कमाना जरूरी है। आलम ये है कि एक वार्ड सदस्य ने कहा कि कि वार्ड सदस्य तो हैं लेकिन कहीं नौकरी मिल जाती तो ज्यादा अच्छा होता, वार्ड सदस्य होने से पेट थोडे भरता है ना इसका कोई भविष्य है।

वैसे तो बिहार के ज्यादातर पंचायत का हाल कमोबेश ऐसा ही है लेकिन किशनगंज के किसी भी पंचायत में आप दिन में चले जाएं तो गांवों में ऐसा सन्नाटा मिलता है जैसे कोई रहता ही ना हो। कुछ बच्चे, महिलाएं और बुजुर्ग खोजने पर मिलते हैं, बात करने पर पता चलता है कि आधे से ज्यादा आबादी कमाने के लिए बिहार से बाहर रहती है। किसी किसी गांव में तो पलायन सत्तर फीसदी से ऊपर है। वैसे तो भारत गांवों का देश है लेकिन इन गांवों की खबरें दिखाने के लिए ना तो कोई मीडिया है ना इनकी स्थिति सुधारने के लिए कोई सरकार। आजादी के पचहत्तर सालों के बाद भी ये गांव अपने विकास की बाट जोह रहे हैं।

Friday, 2 July 2021


फिल्म समीक्षा- राधे

राधे एक अति डिस्टर्बिंग मूवी है इसे देखना परमाणु परीक्षण से भी भी ज़्यादा ख़तरनाक हो सकता है।

फ़िल्म में एक ही किरदार है सलमान और बाकि सब भाई के मनोरंजन के लिए है।

मूवी खत्म होने की रफ़्तार बुलेट ट्रेन से भी तेज़ है इस तरह भाई सरकार का सपोर्ट करते हुए दिखते हैं कि बुलेट ट्रेन ना सही बुलेट मूवी सही।

इस फ़िल्म में रियल लाइफ़ की तरह रील लाइफ़ में भी भाई लोगों पर गाड़ी चढाने का शौक पूरा करते हुए दिख हैं।

फ़िल्म में सबके अधिकारों का ख़्याल रखते हुए सबको अपने हिसाब से डायलॉग बोलने और एक्टिंग करने की छूट दी गई है इसलिए जिसको जो मन कर रहा है वो कर रहा है।

हर किरदार फ़िल्म में कुछ ना कुछ कर रहा है परंतु क्या

करना चाहता है वो स्वयं नहीं जानता है।

सामान्य हालात में ये फ़िल्म देखना आपको पागल कर सकता है इसलिए अपने किसी ऐसे दोस्त के साथ इसे देखें जिसने इस दुनिया से उम्मीद रखनी छोड़ दी हो।

समय के साथ खराब एक्टिंग की मिसाल कैसे पेश कर सकते हैं ये कलाकारों को सलमान से सीखना चाहिए।

जीवन से हताश निराश लोगों के लिए ये फ़िल्म टॉनिक का कार्य करती है कि जब ऐसी फ़िल्में चल सकती हैं तो जीवन क्यों नहीं चल सकता।

बाकि ये मूवी रेटिंग और आलोचनाओं से परे है ट्रेलर से ही पता

चल गया था कि इसको देखने में रिस्क है तो सवारी सामान की खुद ज़िम्मेदार है आप चाहें तो देश के नाम खुला खत लिख कर भी देख सकते हैं बाकि ये फ़िल्म इसलिए भी देखनी चाहिए ताकि पता चल सके कि कैसी फ़िल्में नहीं देखनी चाहिए।



Friday, 20 April 2018


एक बच्ची के साथ ऐसा कोई कैसे कर सकता है..........


रात को दो बजे लाइट बंद करने के बाद सोने के लिए जैसे ही बिस्तर पर सोने के लिए आया देखा मोबाइल पर एक दोस्त का कॉल आ रहा था, चूंकि रात के दो बज रहे थे इसलिए थोड़ी चिंता का हो जाना स्वभाविक ही था, मैंने कॉल उठाया तो उधर सिसकती सी आवाज के साथ एक सवाल आया कि 8 साल की बच्ची के साथ ऐसा कोई  कैसे कर सकता है, वो तो बता भी नहीं सकती कि उसके साथ क्या हुआ, उसे कितना दर्द हुआ होगा, वो रो रही थी और लगातार यही बात दुहरा रही थी।

मैं खामोश चुपचाप उसे सुन रहा था, समझ नहीं आ रहा था उसके इस सवाल का क्या जवाब दूँ कि ऐसा कोई कैसे कर सकता है वो भी 8 साल की बच्ची के साथ, मैं क्या बोलता ऐसा क्यों हुआ, मैं कुछ भी जवाब देने की स्थिति में नहीं था, वही रटारटाया सा जवाब था मेरे पास हम दरिंदे हो गए हैं क्या करें।

वो रोती रही और रोते-रोते उसने बताया कि मुझे डर लग रहा है कि उसकी भतीजियों के साथ भी ऐसा कुछ ना हो, वो दोनों भी बच्ची हैं रोज़ दोनों स्कूल जाती हैं, कही कुछ हो गया तो। मेरे साथ तो घर में ही ऐसा हुआ जब मैं बहुत छोटी थी, मैं किसी को नहीं बता पाई, आज मुझे सब याद आ रहा है कि मेरे साथ क्या हुआ था, मुझे डर लग रहा है कि उनके साथ कुछ ऐसा हुआ तो, किसी ने उन्हें जबरदस्ती छुआ तो क्या वो भी किसी को नहीं बताएंगी जैसे मैंने किसी को नहीं बताया।

हमारी गलती क्या है? क्या लड़की होना हमारी गलती है? मेरे पास उसके सवालों का कोई जवाब नहीं था, मैं उसको क्या दिलासा देता क्या समझता कि चिंता नहीं करो कल से ऐसा कुछ नहीं होगा, कल से अखबार के किसी पन्ने पर किसी बलात्कार की खबर नहीं छपेगी, कल से कोई किसी लड़की को अनैतिक रुप से नहीं छुएगा, कल से किसी घर में खुल के बेटियां बता सकेंगी कि हां उसके साथ कुछ गलत हुआ है।

वो इतनी देर तक रोती रही कि मैं झल्ला गया और उसे चुप कराने के बजाए उस पर चिल्ला बैठा लेकिन ये चिल्लाहट उस पर नहीं खुद पर थी, अपनी बेबसी पर थी कि हर रोज़ की तरह सुबह अखबार के पन्ने पलटते हुए ऐसी कई खबरें दिख जाएंगी, फिर अखबार बंद होने के साथ ये खबरें भी दिमाग के किसी कोने में दब जाएंगी। निर्भया से लेकर आसिफा तक यही हो रहा है आगे भी होते रहेंगे, कई कैंडल मार्च निकालने बाकी हैं तैयार रहिए हम ऐसे ही हैं।

Saturday, 14 April 2018




हम गिरे हुए लोग हैं हमारा कोई ईमान धर्म नहीं.



जी हाँ ये बात ये बात मैं पूरे होशोहवास में कर रहा हूँ। हम डिजर्व ही नहीं करते किसी भी धर्म को पूजना क्योंकि मैंने तो बचपन से यही सुना है और पढ़ा है कि मजहब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना लेकिन हम वही कर रहे हैं, भले खुद कर रहे हों या किसी के इन्फ्लुएंस में आ के लेकिन यही सच है वरना दुनिया का कौन सा ऐसा धर्म है जो बलात्कार को जायज मानता हो या धर्म की आड़ में किसी बलात्कारी को सपोर्ट करता हो।

मैंने जब पढ़ा कि आसिफा के कातिलों को बचाने के लिए वकीलों ने ऐसा हंगामा किया किया कि पुलिस को चार्जशीट दायर करने में 6 घंटे लग गए तो मुझे ये लगा कि हम किस युग में जी रहे हैं? हम क्या कर रहे हैं? क्या सारे सवाल सरकार से होंगे, सिस्टम से होंगे, क्या आपकी औकात है कि आप खुद से सवाल कर सकें कि हम क्या कर रहे हैं।
मैं पूरे होशोहवास में ये बात कर रहा हूँ धर्म के नाम पर हंगामा करने वालों से कि मैं धर्म की कोई ठोस परिभाषा पूछूं कि धर्म क्या है तो कोई बता पाएगा। ये महज संयोग की बात है कि मैं हिन्दू ब्राह्मण परिवार में जन्मा। मैं दलित हो सकता था, मैं मुसलमान हो सकता था, मैं ईसाई, यहूदी, जैन, बौद्ध कुछ भी हो सकता था लेकिन क्या वो मेरा चुनाव होता?  ऐसा होता तो सब समाज के सबसे उपरी पायदान में जन्म लेना चाहते। क्या अभी जो मैं स्वतंत्र रूप से लिख रहा हूँ यही दलित होने पर लिख सकताक्या आत्मविश्वास को भी जाति,धर्म का मोहताज होना चाहिए?

क्या हिन्दू के साथ हुआ बलात्कार मुसलमान के साथ हुए बलात्कार से अलग होता है, क्या किसी मुसलमान की चीखें हिन्दू लड़की की चीखों से कम है, क्या इन चीखों को धर्म के आधार पर विभाजित किया जा सकता है?
हम क्या कर रहे हैं हम क्यों कर रहे हैं कभी पूछा है खुद से अगर आसिफा आपकी बेटी होती (भगवान ना करे ऐसा हो) तो आप ऐसा ही करते।

ये कैंडल मार्च, ये सोशल मीडिया पर जस्टिस फॉर आसिफा चला के कुछ हासिल नहीं होगा। लड़ना है तो अपने परिवार से लड़िए अगर वो हिन्दू मुसलमान में फर्क करता हो, लड़िए अगर वो बेटे के मुकाबले बेटी को कम आजादी देता हो, लड़िए अगर वो किसी और जाति के चाय पीने के लिए अलग ग्लास और खाने के लिए अलग थाली रखता हो।

इतनी जल्दी कुछ नहीं बदलेगा क्योंकि हम भी धारा के साथ उसी में शामिल हो जाते हैं और वही मानते हैं जो हमारा परिवार हमारा समाज आज तक मानते आया है लेकिन अब आपको तय करना है कि आप क्या चाहते हैं।
नारी का अपमान तो महाभारत काल से होता आया है लेकिन वहां भी कोई कृष्ण था लेकिन अब ये आपको तय करना है कि मौका मिलने पर आप दुशासन बनेंगे या कृष्ण?

Tuesday, 26 December 2017

लड़का-लड़की एक दूसरे को जानते थे..........

अक्सर किसी छेड़खानी, लड़की पर तेजाब फेंका जाना, सरे-राह कमेंटबाजी या ऐसा कोई मामला जिसमें लड़के द्वारा लड़की को शारीरिक या मानसिक रूप से प्रताड़ित किया जा रहा हो और पुलिस में शिकायत की जाए तो पहला सवाल यही होता है क्या लड़का-लड़की एक-दूसरे को जानते थे, चलो मान लेते हैं ये पूछना जरूरी है लेकिन अगर लड़का-लड़की एक-दूसरे को जानते थे तो क्या लड़के को ऐसा कुछ भी करने का अधिकार मिल जाता है? क्या पुलिस के लिए बस इतना काफी होता है कि बस लड़का-लड़की एक दूसरे को जानते थे इसलिए मामले की जाँच-पड़ताल नहीं की जाए, उस लड़के को नहीं पकड़ा जाए, उसे सजा ना दी जाए, जमानत पर छोड़ दिया जाए ताकि वो उस लड़की को फिर से टॉर्चर कर सके।
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अभी एक खबर पढ़ी कि लड़के ने लड़की को तीन गोलियां मारी, लड़की पीएमसीएच में भर्ती है और पुलिस का बयान है कि लड़का-लड़की एक दूसरे को जानते थे और लड़की के होश में आने के बाद पूछताछ कर आगे की कारवाई की जाएगी। लड़की इंटर की छात्रा है लड़का उस पर शादी करने के लिए दबाव बना रहा था, इससे पहले भी लड़का, लड़की के घर के घर पर गोली चला चुका था। उसने लड़की को धमकी दी थी कि अगर वो मिलने नहीं आएगी तो उसके माँ औऱ भाई को गोली मार देगा। इस वजह से लड़की को बाहर उससे मिलने आना पड़ा और शराब के नशे में धुत लड़के ने उसे गोली मार दी।

मुख्यमंत्री महोदय मुझे नहीं लगता आपके द्वारा चलाए जा रहे किसी भी योजना का कोई फायदा हो रहा है शराबबंदी है लेकिन शराब में धुत लड़के ने उसे सरे-आम गोली मार दी, बाल-विवाह रोकने की आप बात करते हैं लेकिन जो लड़कियां बाल से अब व्यस्क हो चुकी हैं उनके सुरक्षा की कोई जिम्मेदारी आपकी और प्रशासन की है की नहीं और इसमें भी ये बात तो आपके राजधानी पटना की है तो अन्य जगहों पर हालात क्या होंगे इसका अनुमान लगाना इतना मुश्किल नहीं है।
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अब बात लड़कों के मानसिकता की, वो पता नहीं किस दुनिया में जी रहे हैं, ये समझना क्या इतना मुश्किल है लड़की आपकी जागीर नहीं है कि आपकी तरह उसे भी अपने लिए कुछ भी चुनने की स्वतंत्रता संविधान और कानून ने दी है। आप जब रिलेशनशीप में रहते हो और कोई और नई लड़की आपको मिल जाती है तो आप ब्रेकअप कर के आगे बढ़ जाते हो, लड़की भी थोड़-बहुत रो- गाकर चुप हो जाती है लेकिन कोई लड़की जब आपको छोड़ के आगे बढ़ना चाहती है आपका इगो हर्ट हो जाता है, और आप हर हाल में उसे सबक सिखाना चाहते हो, बदला लेना चाहते हो।  क्या आपका इगो किसी लड़की के जान से भी बढ़ कर है कि उसे सबक सिखाने के लिए आप किसी भी हद तक जाने से नहीं चूकते और फिर कहते हैं कि ये प्यार है।

ऐसा नहीं है कि लड़कियाँ भी सब ठीक ही हैं लेकिन बदला लेने के लिए किसी भी हद तक गिरने वाली बात कम से कम उनके अंदर उतनी नहीं है। अक्सर पुलिस,प्रशासन, समाज, परिवार सब लड़कियों के साथ होने वाली ऐसी घटनाओं के लिए उसे ही जिम्मेदार ठहरा देते हैं कि लड़कों से दोस्ती ही क्यों करती हो, लड़कों के साथ घूमती ही क्यों हो, उनसे बात ही क्यों करती हो, क्या इस समस्या का ये समाधान है कि हम एक प्रगतिशील होते समाज को  फिर से उसी स्तर पर ले जाए जहाँ पुरूष को देखकर महिलाएँ घूंघट कर लें और अपना रास्ता बदल लें ऐसी कल्पना से ही डर लगने लगता है।
इस समाज का निर्माण हमारे हाथ में है और हमें ही सोचना होगा कि हमें इसे किस दिशा में ले जाना है, पुलिस को चाहिए ऐसी किसी भी वारदात में दोषी लड़के पर त्वरित और जल्दी कारवाई हो, परिवार लड़की के साथ मजबूती से खड़े हो और उसे ही कसूरवार ना माने, लड़के के परिवार और दोस्तों को चाहिए कि उसे एहसास दिलाए कि हर इंसान को उसकी मर्जी से जीने का हक है। हम में से हर एक को इस बात को समझना होगा और अगर नहीं समझना तो फिर कितना भी शराब, बाल-विवाह, दहेज आदि कुछ भी रोक दो रसातल में जा रहे इस समाज को नहीं रोक सकते।

(अभिषेक)


Wednesday, 13 December 2017

इस देश की जमीन केवल उद्दोगपतियों की है और गरीबों के लिए फुटपाथ भी नहीं है......


टूट कर गिरा हुआ छप्पर, गिरी हुई बांस की बल्लियां, बुझा और टूटा हुआ चूल्हा, मरघट सा सन्नाटा और उसके पास आँखों में पानी और जाने कितने सवाल लिए खड़ा चायवाला जाने किस सोच में गुम था। आज वापस घर जाते हुए हुए उसके पास बिके हुए चाय और सिगरेट का हिसाब नहीं होगा,कल सुबह जल्दी जगने की हड़बड़ी नहीं होगी, जब उसे उदास देख बीबी उससे सवाल करेगी तो उन सवालों का सामना वो कैसे करेगा, कुछ ही देर में ऐसे जाने कितने सवाल मैंने उसकी आँखों में पढ़ लिए।

ऑफिस के सामने होने के कारण यह हमारे चाय का अड्डा हुआ करता है जहाँ बैठ के चाय पीते हुए जाने कितने क्रिएटिव आइडियाज हमारे दिमाग में आते हैं, कुछ अलग मीडिया हाउस से भी चाय के शौकिन मित्र यहाँ आते रहते हैं इसलिए हमारे लिए यहीं जगह चिलआउट का प्रॉपर प्लेस भी है, कोई बाहर से भी मिलने आता है तो उसे भी यही कहते हैं कि चाय की दुकान पर बैठो चाय बनवाओ हम आते हैं इसलिए भी इस जगह से एक इमोशनल कनेक्ट बना हुआ है।

आज जब उजड़े हुए इस चाय के दुकान को देखा तो लगा जैसे मेरा घर उजड़ गया है, अजीब सा लग रहा था, काफी देर मैं वहीं खड़ा रहा एक- एक कर के चायवाले को सामान बटोरते देखता रहा पूछा कि क्या हुआ तो उन्होंने कहा कि जेसीबी लेकर आए थे सब उजाड़ के चले गए। मैंने कहा क्यों तो बताया कि ये थोड़े कोई बताता है अचानक आता है ऐसे ही उजाड़ के चला जाता है।

मैं सोचने लगा कि क्या इस देश की जमीन केवल उद्दोगपतियों की है और सरकार जिसे मन करे उसे अपने हिसाब से एलॉट कर देती हैं क्या गरीबों के लिए फुटपाथ भी नहीं है जहाँ ये अपनी जीविका चलाने भर कुछ कमाई कर सके। अगर नियम है तो केवल इनके लिए क्यों है उन मॉल्स के लिए क्यों नहीं है जो अपनी जमीन पर तो मॉल बना लेते हैं बाकि वहां आने वाली गाड़ियाँ सड़कों पर पार्क होती हैं। सड़क पर या फुटपाथ पर दुकान लगाना गलत है लेकिन फिर अपनी जीविका चलाने के लिए ये कहाँ जाएं। शहर के बाहर जाकर चाय की टपरी नहीं ना लगाएंगे।

हर बार चुनावों में यही सुनता हूँ गरीबों का कल्याण करने वाली, गरीबी दूर हटाने वाली, गरीबों की सरकार ये अलग बात है कि गरीबी के बदले गरीबों को ही ये दूर भगाने लगती है। हर बार हम मोहरों की तरह वोट देने के लिए इस्तेमाल किए जाते हैं, हर बार गरीब कह के हमें ही लूटा जाता है, हमारे ही वोट से ये वीआईपी हो जाते हैं और हम वैसे के वैसे। जो आपके द्वार पर आकर खुद को गरीबों का बेटा, चायवाला बताकर आपसे वोट ले जाता है जीतते ही उसे आपसे घिन आने लगती है। वो शासक बन जाता है और आपके लिए दरबार लगाता है और इसे अपनी शान समझता है, आप अपने मन से चाहें तो उसे मिल नहीं सकते। वो  जीत कर शहर को स्वच्छ बनाने के लिए आपके चाय के टपरे को उजड़वा देता है।
इस स्मार्ट होते शहर में ये चाय के टपरे, सब्जी वाले, ठेले वाले सब बदनुमा दाग की तरह लगने लगते हैं जिन्हें उजाड़ना हर सरकार को जरूरी लगता है क्योंकि स्मार्ट शहर में हर चीज मॉल में बिकती हुई ही सुंदर लगती है।

(अभिषेक)





Tuesday, 21 November 2017

एक स्वघोषित, स्वनामधन्य सेना के सुयोग्य, कर्मठ और जुझारू कार्यकर्ता से बातचीत.........


प.- जी पद्मावती.......

और पद्मावती का नाम सुनते ही उसकी भुजाएं फड़कने लगी, आँखों से अंगारे निकलने लगे, चेहरा बिल्कुल ड्रैगन की तरह नजर आने लगा, मैंने पूछा भाई क्या हुआ तो उसने मुंह से आग की लपटें निकालते हुए कहा तुझे पता नहीं मैं एक स्वघोषित सेना में बतौर मीडिया सलाहकार काम करता हूँ और मेरा काम ही यही है कि किसी भी हालत में किसी की जुबान से श्री श्री 1008 परमपूजनिया राजमाता पद्मावती जी का नाम नहीं निकलना चाहिए। अरे पापी, नीच, नराधम जिस ने अपने देश के लिए जान दे दी उनका नाम तु अपनी गंदी जुबान से लेता है तुझे शर्म नहीं आती.....


प.- मैंने कहा भाई मैंने तो नाम ही लिया बस....कुछ कहा तो नहीं अभी....

उसने कहा कि नाम भी नहीं ले सकते इस नाम पर ही करणी सेना ने कॉपीराइट करा रखा है जैसे तुम नाम लोगे हम आगे की सारी बातें समझ जाएंगे और पुरूष वर्ग की जुबान और स्त्री वर्ग के लिए नाक काटने का फतवा जारी कर देंगे। इतना ही नहीं हमारी सेना का एक भाग सोशल मीडिया पर बस इसलिए सक्रीय है कि तुम जैसों के फेसबुक, ट्वीटर का प्रोफाइल ढ़ूंढ़ कर तुम्हें ट्रोल कर सके।


प.- भाई लेकिन मैंने तो पढ़ा है कि फिल्म के पहले लिखा होता है इस कहानी के पात्र और घटनाएं काल्पनिक हैं...

पात्र नहीं कुपात्र हैं ये....ये सब मिल के देश का इतिहास बदलना चाहते हैं लेकिन इन्हें पता नहीं है कि हम इनका भविष्य और शारीरिक भूगोल बदल देंगे। याद है ना पिछले साल पड़ाका बजाया था गाल पर, लगता है गूंज भूल गए इतनी जल्दी इसलिए हमलोगों धमकियों का लेवल बढ़ा दिया है इनलोगों को मारने के लिए इनाम का भी ऑप्शन लेकर आए हैं।


प.- भविष्य को लेकर आपकी क्या योजनाएं हैं

देखिए....भविष्य हमारा घनघोर रूप से सुरक्षित है....देश बाद में सुरक्षित होगा पहले हमें इसका इतिहास सुरक्षित करना है...और अपने भविष्य के लिए हमलोग चुनाव लड़ेंगे और इस देश की बौड़म जनता पर हमें पूरा भरोसा है कि हमें जिताएगी भी....और आपका जैसे कि भरपूर मनोरंजन हम लगातार कर रहे हैं आगे भी करते रहेंगे...भंसाली जी को भी हम धन्यवाद देना चाहते हैं जिन्होंने अपने माध्यम से हमें अपनी प्रतिभा को निखारने का अवसर प्रदान किया.....और चलिए अब बहुत सवाल जवाब हो गया अब आगे कुछ भी पूछे तो मुंह से नहीं तलवार से बात होगी....तो फौरन निकल लो......जय हो महारानी की....और सुनो, जयकारा लगाए बिना मत जाना.....
प.- जी सर.... जय हो महारानी की........


(अभिषेक)

Tuesday, 17 October 2017

कहीं दिवाली के दीये सज रहे हैं
तो कहीं भूख से बच्चे मर रहे हैं
सुबह ऑफिस आने का बाद जो नेट पर पहली न्यूज पढ़ी तो दिमाग के कई सवाल आए, ये अलग बात है कि इस सरकार में सवाल करने की आदत धीरे धीरे कम होती जा रही है फिर भी जरूरत पड़ने पर अपनी बात कहने से कभी पीछे नहीं हटता।
तो खबर थी कि झारखंड में भूख से एक बच्ची की मौत हो गई, बच्ची की माँ ने बताया कि आधार से लिंक नहीं होने की वजह से उसे राशन नहीं मिला जिससे घर में खाना नहीं बन पाया, स्कूल बंद होने की वजह से मीड डे मिल का भी ऑप्शन नहीं था और बच्ची ने भात-भात कहते हुए आँखें मूंद ली।
सबसे पहले मुझे सच में  ये विश्वास नहीं हुआ कि सच में इस युग में भी भूख के कारण किसी की जान जा सकती है, ये अलग बात है कि कल वर्ल्ड भूड डे था और विश्व में सबसे भूखे देशों की लिस्ट में हम काफी आगे हैं लेकिन इसका ये मतलब तो नहीं कि हमारे देश में आज भी लोग भूखे मरते हैं। अरे हमारे यहाँ लाखों की संख्या में काम करने वाले एनजीओ हैं, कई ऐसे लोग हैं जो दिवाली में अपने संस्थान के खुद के माध्यम से खुशियाँ बांटने का काम कर रहे हैं और स्लम्स में जा कर दिवाली मना रहे हैं ऐसे में इस बच्ची का मरना इनके लिए काम करने वालों पर सवाल खड़ा करता है।
इसके अलावा क्या केवल आधार का राशन से लिंक ना होना उसकी मौत के लिए जिम्मेदार है कहना मुझे उचित नहीं लगता, अगर कोई आपके आस पास भूख से तड़प रहा है तो उससे ये थोड़े ना पूछते हैं कि तुम्हें खाना क्यों नहीं मिला, क्या तुम्हारा आधार से राशन लिंक नहीं हुआ है, ये सब सेकेंण्डरी बातें हैं प्राथमिक है उसे भोजन उपलब्ध कराना जो ना हो सका।
इस बच्ची की मौत हमारे आगे बढ़ते और प्रगतिशील होते समाज पर कलंक है, रोज फेसबुक पर कई प्रकार के ज्ञान मिलते हैं, कुछ आलोचना कर दो तो लोग कहते हैं आप देश की आलोचना कैसे कर सकते हैं, और आलोचना देश की नहीं यहाँ के व्यवस्था की है जिसमें आज भी भूख से बच्चे मर जाते हैं कैसे मानूं मैं कि देश आगे बढ़ रहा है। तमाम योजनाएं और घोषणाओं का क्या फायदा जब भूख से तड़प के मरने को विवश हैं लोग।
मुझे भी पता है कि मेरे लिखने से कुछ ऐसा बदलने वाला नहीं है लेकिन मन विचलित जरूर है और परेशान भी कि इस मौत का जिम्मेदार कौन है जुमलेबाजी करने वाली सरकार, आधार से राशन को लिंक करने की योजना, वो राशन की दुकान वाला जिसने उस बच्ची के भूख को नहीं नहीं आधार का राशन से लिंक होना जरूरी समझा, वो तमाम संस्थाएं जो गरीबों को भोजन कराने का दावा करती हैं या मैं और आप जिन्हें इससे फर्क नहीं पड़ता कि अभी भी आपके बगल में कोई भूखा सो रहा है??

(अभिषेक)

Sunday, 3 September 2017

बाबाओं का टूटता तिलिस्म
गुरमीत राम रहीम के फैसले के बाद हरियाणा, पंजाब,  थोड़ा दिल्ली और उत्तर प्रदेश में उनके भक्त भावुक होकर उत्पात मचा रहे थे बाबा का ट्वीट उन्हें जितना ही शांत रहने के लिए कहता वो उतने ही आक्रामक और उग्र होकर प्रदर्शन कर रहे थे। इन प्रदर्शनकारियों में महिलाएं, युवा, बुजूर्ग हर तरह के भक्त हैं, वैसे भक्त कहना इन्हें शायद भक्त जैसे शब्द का अपमान करना ही है। ये अलग बात है कि गुरमीत को सजा होने के बाद ज्यादा उत्पाद नहीं हुआ क्योंकि उसके पहले के हालात पर सरकार अपनी किरकिरी करवा चुकी थी।

असल बात ये है कि ऐसे लोग आते कहाँ से हैं और इन्हें ऐसी क्या पट्टी पढ़ाई जाती है कि एक ऐसे आदमी के लिए ये जान देने पर उतारू हो जाते हैं जिसे अदालत दोषी करार देती है। ऐसा भी नहीं है कि ये पहली बार हो रहा है, इससे पहले आशाराम बापू, रामपाल, रामवृक्ष यादव के लिए ऐसा कोहराम मचा था। रामपाल और रामवृक्ष ने तो प्रशासन से लड़ने के लिए एक तरह से फौज का निर्माण कर लिया था।

गुरमीत के पास भी ऐसी संख्या में लोग मौजूद हैं जिनके सोचने समझने की क्षमता लुप्त हो चुकी है और वो जान देने से भी चूकने वाले नहीं हैं। ये केवल अनपढ़, समाज से कटे हुए लोग नहीं है जिन्हें आसानी से बरगलाया जा सके जबकि पढ़े लिखे, दिमाग से संतुलित लोग भी गुरमीत के साथ खड़े हैं। ये अलग बात है कि इनमें काफी संख्या में भाड़े पर बुलाए गए गुंडे भी शामिल हैं जिनका पेशा ही ऐसे उत्पातों को अंजाम देना है। सिरसा में डेरा के मुख्यालय में एक लाख के आस पास लोग मौजूद हैं। एक पढ़ा लिखा आदमी जिसके पास कानून और अच्छे बुरे को पहचानने की क्षमता है वो भला कैसे इन ढ़ोंगी बाबाओं के चक्कर में पड़ जाता है पता नहीं चलता। आज भी ग्रामीण समाज में तबियत खराब होने पर बाबओं से दिखाने और इलाज कराने की प्रथा मरी नहीं है। कई बार इस झाड़ फूंक में लोगों की जान तक चली जाती है लेकिन इनका विश्वास नहीं डिगता।

कई धार्मिक रूप से आस्थावान लोगों से मैंने इस पर बात की तो उन्होंने कहा कि वो सबमें आस्था रखते हैं लेकिन अगर कुछ कानूनी रूप से गलत है तो उसका विरोध होना चाहिए, धर्म के नाम पर किसी रोड के बीच में मंदिर या मस्जिद बने और प्रशासन उसे रोके तो वो उसके खिलाफ लड़ने नहीं जाएंगे। लेकिन ऐसे लोगों की संख्या बहुत कम है।
इस आस्था के नाम पर आम जनता को जो परेशानी हो रही है उसके बारे में सोचना किसका काम है, कई दिनों से इंटरनेट, बसें, ट्रेन सब बंद है जो हमारे दैनिक क्रियाकलाप की चीजें हैं। एक व्यक्ति अपने आप में इतना मजबूत है कि सरकार बेबस नजर आ रही है तो किस व्यवस्था में जी रहे हैं हम। आमतौर पर सरकार भी जनता के मौलिक अधिकारों को नहीं छू सकती लेकिन एक व्यक्ति के वजह से लाखों लोगों का मौलिक अधिकार ताक पर रख दिया गया है इसके लिए भी गुरमीत पर एक मुकदमा चलाना चाहिए, साथ ही उनके साथियों पर देश के खिलाफ युद्ध छेड़ने और देशद्रोह का मुकदमा चलना चाहिए।

शुरूआत में एक तरफ तो यह पूरे सरकार की चूक है जो हाइकोर्ट के आदेश आने तक पता नहीं कहाँ खोई रही कि पता ही नहीं चला कि ऐसे हालात हो सकते हैं, कुछ हरियाणा के कुछ स्थानीय लोगों से बात हुई तो उन्होंने ने बताया कि अजीब सा माहौल हो गया है जैसे कि अपने ही घर में गिरफ्तार हो गए हैं ऐसा लग रहा है। अच्छी बात है कि अब हालात सामान्य हैं इंटरनेट भी बहाल हो गया है लेकिन राज्य सरकार को अभी कुछ दिन सावधान रहने की जरूरत है ताकि ज्यादा असामान्य कुछ नहीं हो और राज्य को होने वाले नुकसान की भरपाई गुरमीत के संपत्ति ले हो। इससे ऐसे बाबाओं का मनोबल भी टूटेगा कि कानून व्यवस्था के उपर कोई नहीं है क्योंकि अपने देश में ऐसे बाबओं की कमी नहीं है और भविष्य में ऐसी घटनाओं से इनकार नहीं किया जा सकता है तो जरूरत है कि अभी से सावधानी बरतें जिससे कि कोई भी राज्य ऐसे बाबाओं के चक्कर में अशांत ना हो।

(अभिषेक)


Sunday, 20 August 2017

बाढ़ तो बस झलकी है............
बिहार में बाढ़ से अभी मात्र 253 मौतें ही हुई है, आँकड़ा ज्यादा तो नहीं लग रहा है ना, वैसे भी अगस्त के महीने में मौतें तो होती रहती हैं। सरकार की इसमें क्या गलती है, हमारी तो आदत है हर मामले में सरकार की कमी निकाल कर उसे गरिया देना। अब मुख्यमंत्री हवाई यात्रा कर के डूबते हुए गाँव, खलिहानों को देख तो रहे हैं लेकिन कर क्या सकते हैं अब तैर तैर के लोगों को बचाएंगे क्या?  बाढ़ आपदा के नाम पर लाखों करोड़ों का फंड रीलिज करा सकते हैं, केन्द्र सरकार से मदद मांग सकते हैं वैसे भी प्रधानमंत्री जी उनके अभिन्न मित्र हो चुके हैं तो कोई दिक्कत ही नहीं है वो तो एक कुत्ते की मौत पर भी भावुक होने वाले लोग हैं फिर तो यहाँ 253 जानें हैं।
एनडीआरएफ की टीम जोर शोर से बचाओ कार्य में लगी है, मेरा गाँव डूबा हुआ है मदद के नाम पर गाँव से 5 किलोमीटर दूर एक स्कूल की छत पर 4 एनडीआरएफ के जवान तैनात हैं जो खाना बनाते हैं खाते हैं और केवल शौचालय के लिए नीचे उतरते हैं। अब लोगों को बचाने में अपनी जान थोड़े देंगे।
सड़क वैसे भी जर्जर ही थी, प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना से एक बार बनी थी उसके बाद बस टूटती रही, अब कई जगह से और टूट गई जिसे बाढ़ के बाद लोकल जीप गाड़ी वाले भर के जाने लायक बना देंगे। गाँव की छतों पर एक-आध पैकेट भी गिरे थे जिसे राहत सामग्री कहा जाता है।
बिजली की कौन बात करे मोबाइल के टावर भी बंद थे जिससे किसी से संपर्क नहीं हो पा रहा था। वैसे आप सोच रहे होंगे मैं ये सब क्यों बता रहा हूँ दरअसल ये उभरते हुए उन्नत भारत की तस्वीर है जिसे सबको आँख खोल के देखना चाहिए।
वैसे असली विपदा तो बाढ़ के बाद की है जब सैकड़ों बिमारियाँ जन्म लेंगी। वैसे भी बिहार में 28000 की आबादी पर एक डॉक्टर की उपलब्धता है ऐसे में बिमारी का सामना करना कठिन होगा। फसलें डूब के बर्बाद हो चुकी होंगी तो इसका खामियाजा लोगों को अगले साल भुगतना होगा जब उनके खाने पर संकट आएगा। फसल से होने वाली कमाई पर निर्भर रहने वालों का दैनिक जीवन जिस भयंकर रूप से प्रभावित होगा उसका अनुमान लगाना कठिन है।
ऐसे में मुझे गोदान के होरी की याद आ जाती है जो साल दर साल कर्ज के दलदल में ऐसा धंसता चला जाता है कि मौत को बाद भी नहीं उबर पाता। आज भी ऐसे होरियों की कमी नहीं है। दरअसल हम इनकी समस्या बस देख सकते हैं, लिख सकते हैं, बातचीत कर सकते हैं, ना समझ सकते हैं ना झेल सकते हैं।
कुछ लोगों का कहना है कि इसमें सरकार क्या करे, मैं पूछता हूं तो सरकार आखिर है ही क्यों बस लोकतंत्र का पर्व मनाने के लिए?  हर पाँच साल में हम लोकसभा विधानसभा के चुनावों के लिए लाइन लगा के मतदान के लिए खड़े हो जाते हैं तय करते हैं अपना भविष्य कि अब सब बदल जाएगा लेकिन बदलता क्या है ये मेरे लिए एक सवाल ही है, आपके मन में सवाल नहीं उठते क्या या आप सवालों से डरते हैं कि आप पूछेंगे तो आपसे कोई पूछेगा तो डरिए मत सवाल आए तो मुझे भी बताइए...हम साथ पूछेंगे अगली बार................

(अभिषेक)
बाढ़ तो बस झलकी है............
बिहार में बाढ़ से अभी मात्र 253 मौतें ही हुई है, आँकड़ा ज्यादा तो नहीं लग रहा है ना, वैसे भी अगस्त के महीने में मौतें तो होती रहती हैं। सरकार की इसमें क्या गलती है, हमारी तो आदत है हर मामले में सरकार की कमी निकाल कर उसे गरिया देना। अब मुख्यमंत्री हवाई यात्रा कर के डूबते हुए गाँव, खलिहानों को देख तो रहे हैं लेकिन कर क्या सकते हैं अब तैर तैर के लोगों को बचाएंगे क्या?  बाढ़ आपदा के नाम पर लाखों करोड़ों का फंड रीलिज करा सकते हैं, केन्द्र सरकार से मदद मांग सकते हैं वैसे भी प्रधानमंत्री जी उनके अभिन्न मित्र हो चुके हैं तो कोई दिक्कत ही नहीं है वो तो एक कुत्ते की मौत पर भी भावुक होने वाले लोग हैं फिर तो यहाँ 253 जानें हैं।
एनडीआरएफ की टीम जोर शोर से बचाओ कार्य में लगी है, मेरा गाँव डूबा हुआ है मदद के नाम पर गाँव से 5 किलोमीटर दूर एक स्कूल की छत पर 4 एनडीआरएफ के जवान तैनात हैं जो खाना बनाते हैं खाते हैं और केवल शौचालय के लिए नीचे उतरते हैं। अब लोगों को बचाने में अपनी जान थोड़े देंगे।
सड़क वैसे भी जर्जर ही थी, प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना से एक बार बनी थी उसके बाद बस टूटती रही, अब कई जगह से और टूट गई जिसे बाढ़ के बाद लोकल जीप गाड़ी वाले भर के जाने लायक बना देंगे। गाँव की छतों पर एक-आध पैकेट भी गिरे थे जिसे राहत सामग्री कहा जाता है।
बिजली की कौन बात करे मोबाइल के टावर भी बंद थे जिससे किसी से संपर्क नहीं हो पा रहा था। वैसे आप सोच रहे होंगे मैं ये सब क्यों बता रहा हूँ दरअसल ये उभरते हुए उन्नत भारत की तस्वीर है जिसे सबको आँख खोल के देखना चाहिए।
वैसे असली विपदा तो बाढ़ के बाद की है जब सैकड़ों बिमारियाँ जन्म लेंगी। वैसे भी बिहार में 28000 की आबादी पर एक डॉक्टर की उपलब्धता है ऐसे में बिमारी का सामना करना कठिन होगा। फसलें डूब के बर्बाद हो चुकी होंगी तो इसका खामियाजा लोगों को अगले साल भुगतना होगा जब उनके खाने पर संकट आएगा। फसल से होने वाली कमाई पर निर्भर रहने वालों का दैनिक जीवन जिस भयंकर रूप से प्रभावित होगा उसका अनुमान लगाना कठिन है।
ऐसे में मुझे गोदान के होरी की याद आ जाती है जो साल दर साल कर्ज के दलदल में ऐसा धंसता चला जाता है कि मौत को बाद भी नहीं उबर पाता। आज भी ऐसे होरियों की कमी नहीं है। दरअसल हम इनकी समस्या बस देख सकते हैं, लिख सकते हैं, बातचीत कर सकते हैं, ना समझ सकते हैं ना झेल सकते हैं।
कुछ लोगों का कहना है कि इसमें सरकार क्या करे, मैं पूछता हूं तो सरकार आखिर है ही क्यों बस लोकतंत्र का पर्व मनाने के लिए?  हर पाँच साल में हम लोकसभा विधानसभा के चुनावों के लिए लाइन लगा के मतदान के लिए खड़े हो जाते हैं तय करते हैं अपना भविष्य कि अब सब बदल जाएगा लेकिन बदलता क्या है ये मेरे लिए एक सवाल ही है, आपके मन में सवाल नहीं उठते क्या या आप सवालों से डरते हैं कि आप पूछेंगे तो आपसे कोई पूछेगा तो डरिए मत सवाल आए तो मुझे भी बताइए...हम साथ पूछेंगे अगली बार................

(अभिषेक)

Thursday, 23 March 2017

डर आपके सरकार से नहीं लगता साहब आपके शोहदों के कार्यकाल से लगता है

सरकार बदल चुकी है, प्रचंड बहुमत के साथ नई सरकार सत्तासीन हो चुकी है लोगों के नई सरकार में असीम बहुमत के साथ विश्वास व्यक्त किया है, मुख्यमंत्री पद के शपथ के साथ तमाम चैनलों पर चौबीस गुना सात चलने वाली बहस कौन बनेगा मुख्यमंत्री जैसी पकाऊ बहसें खत्म हो गई है।
संसद मे बतौर सांसद आदित्यनाथ ने अपने भाषण में काफी चुटीले अंदाज में कहा था खड़गे जी उत्तर प्रदेश में अब बहुत कुछ बंद होने वाला है। उनकी इस बात का असर तड़ातड़ लिए जाने वाले फैसलों में साफ दिखने लगा है। मतलब साफ है कि ये चुप बैठने वाली सरकार नहीं है वैसे ये भी कहा जा रहा है कि नई बहु का रंग कुछ दिन अच्छा ही लगता है।
एक तरफ जहाँ सरकार के अच्छे कदमों की सराहना होनी चाहिए वहीं दूसरी तरफ सरकार की आड़ में कानून व्यवस्था को चुनौती देते और गुंडागर्दी करते लोगों के समूहों पर भी कड़ी कार्यवाही की जरूरत है। चुनाव के समय ये समूह एक विशेष पार्टी का समर्थन करते हैं और फिर उसकी सरकार बन जाने पर खुलकर धांधली करते हैं जैसे नई सरकार ने इन्हें कानून व्यवस्था हाथ में लेने का लाइसेंस दिया हो। चूंकि चुनाव में ये दल उस पार्टी के समर्थन में होते हैं जो सत्ता में आती है तो सरकार भी इनपर कार्यवाही करने से बचती है। ये किसी एक पार्टी की कहानी नहीं है, हर पार्टी के साथ ऐसे छुटभैये जुड़े रहते हैं। पिछली सरकार के कार्यकाल में भी आए दिन टोल बूथ पर होती लड़ाईयाँ अभी भूली नहीं हैं।

चुनाव में भाजपा वे अपने घोषणापत्र में कहा था कि महिलाओं की सुरक्षा के लिए एंटी रोमियो स्कावयड का गठन करेगी जिसे अब अमली जामा पहनाया जा रहा है। क्या इसका मतलब ये है पहले पुलिस महिलाओं के साथ हुए ऐसे वारदात से अच्छे से नहीं निपटती थी?  एंटी रोमियो स्कावयड में शामिल पुलिस अब लड़कों से अजीबों गरीब सवालात कर रही है जिसमें फटे हुए जींस से लेकर टी-शर्ट के उपर शर्ट का बटन खोल कर भी चलने पर सवाल किए जा रहे हैं। सतीश ने बताया कि वो म्यूजिक से जुड़े हुए हैं और स्टाइलिश दाढ़ी रखते हैं, फैशन के लिए कभी कभी शर्ट खोल के बाइक चलाते हैं कल उन्हें रास्ते में रोक कर सवाल किए गए जो अजीब था। ऐसे ही कई शहरों से अपने बहन को कॉलेज से लाने गए लड़कों को भी चेतावनी दी गई तो कहीं उठक-बैठक भी कराया गया। डर है कि ये एंटी रोमियो स्क्वायड कुछ तथाकथित हिन्दू संस्कृति रक्षक दलों की तरह कहीं साथ बैठे कपल से आपस में राखी ना बंधवाने लगे या मारपीट ना करने लगे। यहाँ तक की बनारस के शहीद उद्दान में अकेले बैठे लड़कों को भी बुला कर चेतावनी दी गई।

 बनारस में कल कई शराब की दुकानों को बंद करने को लेकर बवाल काटा गया। आमतौर पर अखबारों में आया कि ये महिलाओं के द्वारा किया गया हंगामा था जिसमें शराब की दुकानों पर तोड़ फोड़ की गई हो सेल्समैन को मारा पीटा गया, शराब की बोतलें फेंक दी गई लेकिन कुछ लोगों से बातचीत करने पर पता चला कि इसमें कुछ युवक भी शामिल थे और कई जगह के डिपार्टमेंटल स्टोर पर दुकानों के अंदर टेबल कुर्सीयाँ तोड़ दी गई और बाकि सब्जियाँ, पनीर जैसे आइटम भी फेंक दिए गए। बाहर पुलिस चुपचाप खड़े तमाशा देख रही थी।

अगर शराब बंद ही करना है तो इसके लिए एक कानूनी प्रावधान लाना होगा ऐसे हंगामें कर और अपनी नौकरी कर रहे कर्मचारी को पिटने के लिए लोगों पर कानूनी कारवाई होना चाहिए। ठीक ऐसा ही बूचड़खानों के साथ भी है विदित हो कि पिछले साल कई जगह पशुओं को लेकर जा रहे ट्रक वालों को कुछ लोगों ने घेर कर मार दिया था।

बात ठीक है जो चीजें गलत हैं वो बंद हो लेकिन ये कानूनी दायरे में ही हो वरना ना गुंडाराज ना भ्रष्टाचार का नारा देने वाली सरकार के राज में ही गुंडाराज को बढ़ावा मिलने लगेगा।

(अभिषेक)