Wednesday, 1 October 2014

आत्मस्वाभिमान किसी उम्र का मोहताज नही होता, मैं ये भी नही कह सकता कि वो पारिवारीक प्रिष्ट्भूमि से आता है लेकिन ये जरुर है कि उसका उम्र से कोई लेना देना नही है। ये उस बच्चे में भी हो सकता है जो इस शब्द का मतलब तक नहीं जानता। दरअसल इन सब बातों को बताने के पीछे एक वजह है और वो है एक छोटा सा लड्का जो मुझे मेरे एक मित्र के विद्दालय में मिला।
मै हाल में हीं अपने घर गया हुआ था, अचानक वहां से एक दिन दोस्तो के साथ नेपाल घुमने का प्लान बना जो वहा से महज़ 45km दूरी पर है रास्ते में ही एक मित्र का स्कूल है तो सोचा उसे भी साथ ले लेते हैं। वो छुट्टी लेने गया तब तक हमलोग एक बच्चे से बात करने लगे। बातों बातों में मैनें ध्यान दिया कि बच्चे के पैर में चप्पल नहीं था तो मैनें उससे पुछा कि चप्पल क्यों नहीं पहन के आये हो तो बच्चे ने बताया कि टूट गया है। धुप बहुत ज्यादा थी और ऐसे में बच्चे का ये जबाब सुन के इंसानियत के नाते थोडी भावुकता का आना तो स्वभाविक था। अलकतरे की सड्क पर नंगे पैर चल के आने का मर्म भला कौन नही समझ सकता। 
मैनें कहा कि चप्पल क्यों नहीं बनवाते तो उसने कहा "पैसे नहीं नहीं हैं, पापा बाहर गये हैं कमाने, वो पैसे लेकर आयेंगे ताब चप्पल लुंगा।" 
मुझे इस जबाब कि उम्मीद बिल्कुल नहीं थी। मैंनें उसे कुछ पैसे देने चाहे पर उसने साफ़ इनकार कर दिया कि नहीं वो चप्पल अपने पापा के आने के बाद हीं लेगा। कैसे भी समझाया मैं उसका बडा भाई हुं उसके पापा से वापस ले लंगा मैं तब जाके वो माना।
शिक्षा जरुरी नहीं कि आपके बडे ही दे पाये हर किसी से सिखने को मिलता है पर जरुरी उस शिक्षा का सदुपयोग। इंसान छोटी छोटी चीजें देखता तो है पर ये सोच के आगे बढ जाता है कि उसे क्या मतलब या उसके जीवन पर इससे क्या फ़र्क पडता है।
सरकार मिड डॆ मिल योजना चला के समझती है उसकी जिम्मेदारी पूरी हो गई और वो बहुत अच्छा काम कर रही है पर जो बाकी छोटी छोटी चीजें है क्या उसके लिये कोई व्यवहारपरक योजना नहीं बनाई जानी चाहिये?
ये तो एक बच्चे की बात है जो मेरे सामने है जाने ऐसे कितने बच्चे इस देश में हैं जो तमाम मुश्किलो से जुझ रहे हैं। 
वैसे हर जिम्मेदारी सरकार पर हीं छोड देना ठीक नहीं है। ये कुछ ऐसी चीजे हैं जो हमारे आपके सामने दिखती हैं और हम अपना मुंह मोड के सरकार को कोसते हुए चल देते हैं। जरुरत है असली जरुरतमंद को समझने की और उस हद तक उसका मदद करने कि जहां तक अपना नुकसान ना होता हो वरना लानत है ऐसे विकास पर जो आपको तो सबकुछ देता हो लेकिन किसी को एक चप्पल तक नसीब ना हो।

Friday, 19 September 2014

कभी कभी सोचता हु लाइफ़ फ़िल्मों की तरह होती तो कितना मजा आता, 3 घंटे मे सब कुछ, प्यार, तकरार, इजहार, इनकार, मार, और तमाम चीजे जो मसालेदार हो और अंत में जा के सब कुछ अपने हिसाब से सेट हो जाता है वरना पिक्चर बाकी है मेरे दोस्त।
और एक जीवन है जहां लडकी का आगमन ही, इतना विलंब होता है कि पुछिये मत, हमारे यहा तो ऐसा है कि लड्के ने अगर हिम्मत कर के लड्की से टाइम भी पुछ लिया (क्योकि हमारे क्लास में लड्कियां ही घडी पहन के आती थी लड्के को दसवी बोर्ड के बाद ही घडी देने का प्रचलने है वो भी प्रथम स्रेणी में) तो लडकी का जबाब होता था "भैया 5.30" और सारी मोहब्बत वही दम तोड देती थी।
उसके बाद का समय लडका इंजीनियरिंग की तैयारी में लगा देता है (हमारे तरफ़ अभी भी बहुत क्रेज है इसका) लड्का सोचता है कि जैसे ही कालेज मेम जायेगा पहला उद्देश्य यही होगा कि एक अच्छी लड्की से दोस्ती करना (मोहब्बत तो बाद में हो ही जायेगा) लेकिन उस बेचारे को क्या पता यहां कम्पटिशन इंजीनियरिंग इन्ट्रान्स से ज्यादा होता है और लडका और लडकी का अनुपात कम से कम 1:15 का होता है फ़िर वो जिस लडकी को पसंद करता है वो किसी और को पसंद करती है तो वो चाह के भी कुछ नहीं कर पाता और फ़िर उसपे प्रहार होता है उसके शुभचिंतक दोस्तो को जो उसे देवदास बनने की ओर अग्रसर करते हैं ये भाग भी कुछ दिन में समाप्त हो जाता है और लड्का हो जाता है खाली हाथ ।
 कुछ दोस्तो को लड्किया मिल भी जाती है क्योकि उन्होनें कसम नही उठाई होती है कि अमुक लडकी से ही रिश्ता जोडना है, कालेज खत्म होने के साथ ही रिश्ता भी खत्म हो जाता है। कुछ का आगे बढता तो है लेकिन जाति, समाज, बंधन, ध्रर्म, और खास तौर पर पिता जी के नाक बचाने के लिये खत्म कर दिया जाता है।
हाल में ही कुछ ऐसे दोस्तो का पता चला जिन्होंने सफ़लतापूर्वक सबके सहमति से अपने रिश्ते को अंजाम तक पहुंचाया उन्हे दिल से शुभकामनायें और उनके परिवारजनों का आभार जिन्होनें उन्हे समझा और आगे बढ्ने का मौका दिया वरना लाइफ़ में जब भी फ़िल्मे देखते यही सोचते कि ये सब बस फ़िल्मों मे होता है और उनकी कहानी तो दुसरे चरण में हीं रुक गई थी और मेरी तरह फ़ेसबुक के सहारे शेयर कर रहे होते.............
(19/09/2014)

Thursday, 3 July 2014

ये कहानी हमारी नहीं है, ये कहानी है के बाइक कि जिसने अपना जीवन हमारी सेवा में समर्पित कर दिया। जब हम बी.टेक कर रहे थे तब हमारे पास हीरो होण्डा की स्पेल्नडर हुआ करती थी, वैसे थी तो वो याहया रईस की लेकिन कभी लडके ने अपना हक नही जताया यहं तक कि उसके खुद के काम के लिये भी उसे चाभी मांगनी पडती थी। वैसे भी उस बाइक ने कभी रुकने का नाम नही लिया, कोइ ना कोइ उस पर हमेशा सवार ही रहता था। एक अजीब सी खासियत थी उस बाइक की उसके पीछे का इंडीकेटर हमेशा टूटा रहता था और उसे जब भी बनवाने का प्रयास किया गया वह वापस अपने पूर्ववत अवस्था में जाता था याहया ने ना कभी उस बाइक पर अपना अधिकार जताया और ना कभी हमने जताने दिया। अक्सर चाभी रुम . में रहती थी जो सबका सामूहिक कमरा था। बाइक पे सवारी तो लोगो की ही होती है लेकिन मुझे वो एक भी दिन नही याद जब उसपर से कम लोग बैठे हो हां ये संख्या अधिक जरुर हो जाती थी जब कुछ जरुरत से ज्यादा प्रतिभावान लोग होते थे और जिनकी शारीरिक संरचना उन्हे अनुमति देती थी कि वो लोग आराम से बैठ जाये ऐसे लोगो मे थे मैं, भानू, क्रिष्णा, याहया, अभिषेक पांडेयराज और अभिषेक यादव बाकी इसी मे परिवर्तन होता रहता था और कुछ नये लोग जुड्ते रहते थे। बैठने की व्यवस्था ऐसी थी कि एक कोइ टंकी पर बैठता था जो हैण्डल पकडता था और उसके पीछे बैठा हुआ गेयर बदलता था बाकी पीछे बैठे दो लोग बाइक को संतुलन प्रदान करते थे। सब पढने वाले थे और पैसे की किल्ल्त हमेशा रहती थी इसलिये उसमे १० से २० का पेट्रोल डलाया जाता था इसका एक कारण यह भी था कि पेट्रोल उतना ही डलाया जाता था कि जाके बस वापस आया जा सके वरनी ये होता कि तेल भराये कोइ और घुमे कोइ और कुल मिलाकर पहले दो साल में इस बाइक ने हमारा खुब साथ निभाया जिसने लखनऊ शहर से हमारा परिचय कराया, जिसने टुण्डे कबाब का हमें पहली बार स्वाद चखाया, जिसने हजरतगंज और सहारागंज में नाइट शो देखने मे अपना योगदान दिया, आलमबाग चौराहे की चाय हो या दिपू और बिल्लू भैया की चाय सबमें वह हमेशा ह्मारे साथ खडा रहा। लखनऊ के पहला सफ़र के गवाह और हमारे यादो का साथी जहा भी हो उसका शुक्रिया तहे दिल से सब दोस्तो की तरफ़ से करता हू मैं। और बाईक के मालिक का शुक्रिया इसलिये नही क्योकि वो ह्मारा परम मित्र हम सबकी जान है जिसके साथ हमने इतने मजाक किये फ़िर भी हमारे साथ हमेशा खडा रहा याहया रईस।

Thursday, 15 August 2013

वैसे तो exam कभी  लिए excitement की चीज़ नहीं रही इसके कारण  भी कुछ थे जैसे semester बस कहने के लिए 6 महीने का होता था but exam तो हर 3 से 4 महीने में आ जाता था । फिर उस बीच में internal exams की जिस   बाढ़ से गुज़रना   पड़ता था उसके बारे में तो पूछिये मत।  sem xam लिखने में तो कोई परेशानी नहीं थी कौन सी copy पुरे class में दिखाई जाएगी सो हम भी बेधड़क लिखते थे बस लिखते ही थे ये मत पूछियेगा की क्या लिखते थे क्योकि मै बता भी नहीं पाउँगा की मेरे कुछ खास मित्र उसमे दैनिक जागरण से लेकर TIMES OF INDIA और  TUNDEY  KABAB  तक की घटनाओ का ज़िक्र भी करते थे और बाकायदा अछे numbers से पास भी हुए without back सो उन्हें सलाम ।
हाँ तो हम थे की xam को लेकर कोई भावनाएं नहीं थी हमारी वो एक साधारण सी बात थी लेकिन इसमें बदलाव तब हुआ जब 2nd year में हमारा center बदल के थोड़े दूर के कॉलेज पंहुचा और वह जाने के लिए college की तरफ से hostelers के लिए बस का इंतजाम हुआ ।
सबसे अच्छी बात ये थी की लड़के और लड़कियां एक ही बस में जायेंगे ये एक ऐसा सुखद समाचार था जिसके बारे में सोच सोच के ही मन खुश हो जाता था और हम बेसब्री से इंतजार करते थे की xam sem में एक ही बार क्यों होता है कम से कम 3 बार तो होना ही चाहिए । खैर हमारे लिए UPTU के नियम थोड़े बदलते । शायद किसी भी sem के वो सबसे अच्छे दिन होते थे हम सबके लिये। कुछ मित्र गन के सहयोग से बाहर मतलब dayscholar लडकियां भी बस में जाती थी जिस से माहौल और भी अच्छा हो जाता था की कुछ तो संख्या बढ़ी ।
xam वाले दिन सब अच्छे अच्छे कपडे पहन के तैयार हो के बस में सवार  होता था  जय शिव शंकर हर हर महादेव और भगवती के जयघोष  के साथ बस खुलती थी । हम जितना पढ़े रहते थे हमारे लिए काफी होता था और हमारी तफरी शुरू हो जाती थी जिस से लड़कियों के चेहरे के भाव बदलते रहते थे और उनकी पढने में हो रही परेशानियां स्पस्ट होती थी । ऐसा लगता था की   सारी sem की पढाई इसी बस में कर लेनी है लेकिन सच्चाई तो ये थी की अनगिनत बार वो उस subject को revise कर रही होती थी ।
कुछ हमारे मित्र चाह कर भी अपने madam हमारे हिसाब से भाभी जी के पास नहीं बैठ पाता था की लड़के पीछे से क्या बोलेंगे कुछ पता नहीं था एक बड़ा ही अच्छा सा coment याद आ रहा है कि "हम यहाँ मरेंगे क्या " ये तब था जब कोई हमारा साथ छोर के किसी बालिका के साथ बैठता था ।
जैसे तैसे हम xam देते समय थोडा बर्दास्त कर के चले भी जाते थे but xam से निकलने के बाद बस से हॉस्टल आते समय जो एक से एक  बयानबाज़ी से हंस हंस के बुरा हाल हो जाता था इसका फायदा हमारे कुछ engage मित्र उठाते थे और अपने मैडम के साथ कुछ समय बीताते थे हम इसे poweplay कहते थे ।
कुछ समय शायरी गानों का तो कुछ फिल्मो के dialouge का होता था जैसे "क्या तारा सिंह को passport  नहीं मिलेगा तो वह पकिस्तान नहीं जायेगा " "अगर तुम्हारे दरवाज़े पे बारात आई तो डोली की जगह अर्थी उठेगी और सबसे पहले उसकी उठेगी जिसके सर पे सेहरा होगा " "इन हाथो ने हथियार चलाना छोरे हैं भूले नहीं हैं " "सातों को मारूंगा एक साथ मारूंगा " ये सब कुछ यादगार बयां हैं जो आज भी ज़ेहन में बसे हुए हैं और इन्हें बोलने वालो के नाम भी । शायरी और कविता में कुमार विश्वास जी के कविताओ का पूरा सहयोग मिला ।
लड़कियों की दुनिया अलग होती थी उनमे भी group बनते हुए थे और सबकी मस्ती का अलग प्रकार था कुछ को बस में परेशानी थी जिस के कारन वो चुपचाप खिड़की के बगल में बैठ के नजारो को देखते हुए जाती और देखते हुए आती थी और कुछ पूछने पे हलके से मुस्कुरा देती थी जैसे मुस्कुराने से नंबर कम हो जायेंगे ।
वैसे तो कभी कभी ऐसा होता था जब लड़के एक दुसरे से पूछे की xam कैसा गया है क्योकि सबको एक दुसरे की हकीकत मालूम थी लेकिन लडकियो से पूछना तो लाज़मी था । कुछ लोगो के मुह से 4 साल में एक बार भी नहीं सुना की paper अच्छा हुआ है उनके हिसाब से back आना तय है लेकिन marks hamesha 70% से ज्यादा । मै इसका मतलब आज तक नहीं समझ पाया की ये क्या चक्कर था ।
आज भी जब कभी ये सब dialouge सुनता हू या किसी को ऐसे मस्ती करते देखता हू तो सब फिर से याद आ जाता है जितने अच्छे से ये सब होता था उतने अच्छे से और उतनी बाते मै लिख तो नहीं पाया हूँ बस एक प्रयास भर किया है फिर वो सुखद याद हमेशा दिल में रहेंगी चाहे मै कही भी और कैसा भी रहूँ ॥ 

Thursday, 1 August 2013

अक्सर राह चलते, कही आते जाते,सोते जगते,किसी से बात करते समय ऐसी बातें याद आ जाती हैं जिससे अचानक मुस्कुराहट चेहरे पे आ जाती है और दिल खुश हो जाता है। इन्सान कैसे कैसे काम करता है जिसका कोई मतलब नही होता लेकिन कितना मजा आता है करने में। घटना है मेरे कालेज के दिनों की जब मोबाइल में प्रति सेकेंड दरें होती थी। हम क्लास में किसी का भी ध्यान अपनी ओर दिलाने के लिये मिस्काल करते थे अक्सर ये काम किसी बालिका के साथ ही किया जाता था अब बालक तो सब साथ ही होते थे तो उनका ध्यान दिला के क्या फ़ायदा था।
बालिका देख के मुस्कुरा देती क्लास में आना सफ़ल हो जाता था उस दिन का ।
फिर होता था क्लास में miscal  का खेल कौन किस से विजयी होता है किसका miscal  सफल और किसका miscal  कॉल मे बदल जाता है इसका युद्ध  था वह । खर ऐसे में जब कभी टीचर ने देख लिया तो एक ही प्रश्न पूछता था क्यों हंस रहे हो हमें भी बताओ ताकि हम भी हँसे और हम सोचते थे की अब क्या बताये की यहाँ किस तरह की बात चल रही है सो हमारा भी एक ही जबाब होता था कुछ नहीं सर । 
ये तो था जो दूर बैठे हैं उनके लिए और इसमें बातों  का आदान प्रदान नहीं होता था । तो बात चीत का एक और जरिया था कॉपी पे लिख के उधर टीचर की पढाई और इधर अपनी बातें दोनों का कोई तालमेल नहीं था हमने technology का भी अच्छा इस्तेमाल किया था msgpack करवा के और इन्टरनेट के जरिये score share करते थे । कुछ टीचर्स ने हमें आज़ादी दी थी की जो मन करे वो करो शायद उन्हें ये ज्ञान हो चूका था की ये नहीं सुधर सकते और इन्हें क्लास का कोई फर्क नहीं पढता और न ही इनका रिजल्ट क्लास के lecture पे depend करता है। इन सब में एक बात थी की इन सब वज़हों से हमारा रिजल्ट कभी ख़राब नहीं आया ताकि कोई इलज़ाम लग सके. 
एक घटना है जब हमारे सर कुछ important topic पढ़ा रहे थे और हमारा सारा ध्यान तेंदुलकर के शतक पर था अचानक खबर मिली की सचिन out मैंने confirm करना चाहा "सही बताओ  " बदले में किसी मित्र का नहीं सर का reply आया "by  god " पहले तो हम कुछ समझ नहीं पाए और जब समझ आया तो इतनी हँसी आई की पूछिये मत। जो भी मेरे मित्र हैं शायद अभी भी उन्हें ये बात याद होगी । 
एक हमरे बहुत प्यारे सर थे जिनकी क्लास 9 :55 से  शुरू होती थी हम उस समय कैंटीन में चाय पीने जाते थे फिर हमारा आगमन 10 :15 पे होता था और फिर हम 20 बाद ही निकल जाते थे चाय पीने और सर हमेसा की तरह अनुमति दे देते थे इसके लिए हम सब मित्र उनके सदा आभारी रहेंगे । 
अभी के लिए इतना ही आगे की कुछ बातें अगली कड़ी मे।  


Monday, 6 May 2013

"आरक्षण" जबसे जन्म हुआ है इसे सुनता आया हूँ और बिना सोचे समझे इसे अपने लिए अभिशाप मानते आया हूँ ....वैसे मुझे अभी तक इसकी वज़ह से किसी समस्या का सामना नहीं करना पड़ा है लेकिन इसकी वज़ह से होने वाले अन्तर  का पता तो है ही कम से कम. ......
संविधान ने हमारे लिए समानता का अधिकार की व्यवस्था की है (अनुच्छेद १४ से १ ८  ) जब  संविधान निर्माण हो रहा था तब वाकई इस देश में SC /ST की हालत बहुत ही बुरी थी जिसे सामान्य हालत में लाने  के लिए और उन पर भी समानता का अधिकार लागु करने के लिए आरक्षण जरुरी था .....वे आर्थिक, सामाजिक, राजनितिक हर क्षेत्र में पछडे हुए थे…… अतः उनके लिए 10 वर्ष के लिए आरक्षण देने का प्रस्ताव रखा गया जो उचित भी था और किसी ने इसकी आलोचना नहीं कि…… धीरे धीरे ये समय बढ़ता गया ...मुझे जैसा लगता है तब संविधान निर्माताओं ने सोचा होगा की अगले 10 वर्ष में अपना लक्ष्य प्राप्त कर लेंगे और पिछड़े तबको को सबके साथ सामान रूप से ला खड़ा करेंगे जो नहीं हो सका .....अब आज़ादी के 67 वर्ष बाद भी हम उस लक्ष्य को नहीं पा सके हैं ये कितनी बड़ी विडंबना है…. यहाँ तक की कुछ नए लोग भी पिछड़े हो गए है……   जाने ये  कैसा विकास है की जहाँ  दिन प्रति दिन  लोग और जातियां संपन्न और समृद्ध होनी चाहिए वो पिछड़ती  जा रही हैं और अपने पिछड़ेपन को ऐसे दिखा रही हैं जैसे यही उनका विकास है और सरकार भी उनकी तुस्टी-पूर्ती के लिए उन्हें आरक्षण का तोहफा देने में लगी हुई है… जैसे नए पे OBC आरक्षण .......इसके अलावा कई जातियां इसमे शामिल होने के लिए आन्दोलन कर रही हैं। देर सबेर उनका नाम भी आरक्षितों की श्रेणी में आ ही जायेगा ........
सामान्य जाती के लोगो की स्थिति जस की तस बनी हुई है, तब भी वैसी ही थी और आज भी वैसी ही है कोई परिवर्तन नहीं  जबकि मैंने अपनी आँखों से देखा है ऐसे सामान्य जाति के लोगो की जिसके पास ना खाने को ढंग का खाना है न पहनने को ढंग के कपडे फिर उनके बछो की पढाई की बात कौन करे   ......
आज हर engineering और medical entrance exam के form की fee 2000rs से कम नहीं है जब कोई फॉर्म ही नहीं भर पायेगा तो परीक्षा की बात कौन करे और यहाँ तो उनके पहनने खाने की समस्या है तो पढने की बात कौन करे .....
सरकार की राजनीती जातिगत समीकरणों पे टिकी है ऐसे में सामान्य की बात कौन सोचेगा क्योकि इनके चुनाव में भाग लेने और न लेने से कोई फर्क नहीं पड़ता ......कही my  (मुस्लिम,यादव ) काम करता है तो कही भूरा बाल साफ़ करो (भूमिहार,ब्राह्मण ) का नारा इन्ही राजनेताओ के द्वारा बुलंद किया जाता है…. 
एक देश एक भेष सब कहावत है जबकि सच्चाई ये है की हम सबको आपस में  बाँटने का काम ही सरकार ने किया है… 
मुझे याद है मेरे कॉलेज में अक्सर ये बहस का मुद्दा होता था की किस जाति  की scholarship आई  है…किसका एडमिशन किस कोटे में हुआ है. 
अगर जल्द ही व्यवस्था को नहीं रोक गया तो धीरे धीरे जो आग सबके अंदर सुलग रही है वो विस्फोट का रूप ले लेगी और ये देश अपने ही आतंरिक एकता को नहीं बचा सकेगा और हमारे विकसित राष्ट्र होने का सपना चकनाचूर हो जाएगा  ………

Saturday, 4 May 2013


फिर वही अंदाज़ वही एहसास वही मस्ती वही मजा .....लिख रहा हूँ और यादों के साथ हंसी आ रही है......कल का टैग  "भाई पहली बार है क्या???? "
घटना है याह्या रईस की मुंबई से आने की .....मैं और भानु ने एअरपोर्ट जाने का जोखिम उठाया आखिर हम हीं तो हैं जम्बाज़ खिलाडी ......AIIMS पे मेरी और भानु की मुलाकात हुई वही से सोचा ऑटो ले लेते हैं क्योकि फोन पर याह्या के आने की सुचना मिल चुकी थी और गालियों का आदान  प्रदान प्रारंभ हो चूका था सो हमें भी जल्दी पहुचना था .......
मिश्रा यानि मैं -भाई IGI चलोगे ?
औटोवाला- ये कहा है?
भानु-एअरपोर्ट
औटोवाला-चलेंगे कहा से चलना है (हमें घूरते हुए )
मैं -यही से
औटोवाला- सामान नहीं लेंगे??
भानु- हम ऐसे ही चलते हैं,  चलना है??कितना लोगे?
औटोवाला- २००
मैं- रहने दे हम चले जायेंगे
फिर थोड़ी देर बाद गालियों से बचने क लिए ऑटो कर लिया वरना याह्या के हिसाब से हम उसे pick  नहीं बाद drop  करने जाते
खैर हम पहुचे तो पता लगा भाई साहब किसी मंदिर के पास खड़े हैं और हमारी नज़रे किसी मंदिर को नहीं देख पा रही थी हाँ सेक्सी dresses  में airhostes की कतार से नज़रे नहीं हट रही थी
hamdono  दोनों भूल चुके the  की ham  याह्या के लिए आये हैं यहाँ खैर याह्या का फिर कॉल आया तो मंदिर  की तलाश शुरू हुई पूछते पूछते एक मंदिर पे पहुचे तो पता लगा ये वो मंदिर नहीं जहा वो है कैसे भी पहुचे भाई से मिले .....लगा नहीं की इतने दिन बाद mil रहे हैं सब अपने rang  में थे ......याह्या क हिसाब से पुरे प्लेन के स्टाफ और यात्री को पता चल गया था की ये उसकी पहली हवाई यात्रा है
जब DELHI  आके याह्या ने अपने सामान पूछा तो पता लगा की लखनऊ में मिलेगा वैसे हमें तो पहले से ही पता था  की याह्या का सामान लखनऊ में हीं मिलेगा वैसे याह्या ने जब पूछा की मेरा सामान कहा है तो किसी ने बदले में फिर उस से सवाल पूछ लिया की पहली बार जा रहे हो क्या??? मैंने कहा की याह्या को कहना चाहिए था की जो पहली बार जाता है उसके सामान नहीं मिलता है क्या बे और अगर हमसब साथ होते तो मुझे पूरा विस्वास है की ऐसा ही होता........कुछ खाने पिने और बिल पेमेंट को लेके झगड़ने में एक अंकल को परेसान और हलकी चोट पहुचने के बाद याह्या को वापस भेज और हमने कुछ airhostess ताड़ी और वापस आ गए....थोडा नेहरु प्लेस में विश्राम लिया और फिर रूम वापस.........