Sunday, 20 August 2017

बाढ़ तो बस झलकी है............
बिहार में बाढ़ से अभी मात्र 253 मौतें ही हुई है, आँकड़ा ज्यादा तो नहीं लग रहा है ना, वैसे भी अगस्त के महीने में मौतें तो होती रहती हैं। सरकार की इसमें क्या गलती है, हमारी तो आदत है हर मामले में सरकार की कमी निकाल कर उसे गरिया देना। अब मुख्यमंत्री हवाई यात्रा कर के डूबते हुए गाँव, खलिहानों को देख तो रहे हैं लेकिन कर क्या सकते हैं अब तैर तैर के लोगों को बचाएंगे क्या?  बाढ़ आपदा के नाम पर लाखों करोड़ों का फंड रीलिज करा सकते हैं, केन्द्र सरकार से मदद मांग सकते हैं वैसे भी प्रधानमंत्री जी उनके अभिन्न मित्र हो चुके हैं तो कोई दिक्कत ही नहीं है वो तो एक कुत्ते की मौत पर भी भावुक होने वाले लोग हैं फिर तो यहाँ 253 जानें हैं।
एनडीआरएफ की टीम जोर शोर से बचाओ कार्य में लगी है, मेरा गाँव डूबा हुआ है मदद के नाम पर गाँव से 5 किलोमीटर दूर एक स्कूल की छत पर 4 एनडीआरएफ के जवान तैनात हैं जो खाना बनाते हैं खाते हैं और केवल शौचालय के लिए नीचे उतरते हैं। अब लोगों को बचाने में अपनी जान थोड़े देंगे।
सड़क वैसे भी जर्जर ही थी, प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना से एक बार बनी थी उसके बाद बस टूटती रही, अब कई जगह से और टूट गई जिसे बाढ़ के बाद लोकल जीप गाड़ी वाले भर के जाने लायक बना देंगे। गाँव की छतों पर एक-आध पैकेट भी गिरे थे जिसे राहत सामग्री कहा जाता है।
बिजली की कौन बात करे मोबाइल के टावर भी बंद थे जिससे किसी से संपर्क नहीं हो पा रहा था। वैसे आप सोच रहे होंगे मैं ये सब क्यों बता रहा हूँ दरअसल ये उभरते हुए उन्नत भारत की तस्वीर है जिसे सबको आँख खोल के देखना चाहिए।
वैसे असली विपदा तो बाढ़ के बाद की है जब सैकड़ों बिमारियाँ जन्म लेंगी। वैसे भी बिहार में 28000 की आबादी पर एक डॉक्टर की उपलब्धता है ऐसे में बिमारी का सामना करना कठिन होगा। फसलें डूब के बर्बाद हो चुकी होंगी तो इसका खामियाजा लोगों को अगले साल भुगतना होगा जब उनके खाने पर संकट आएगा। फसल से होने वाली कमाई पर निर्भर रहने वालों का दैनिक जीवन जिस भयंकर रूप से प्रभावित होगा उसका अनुमान लगाना कठिन है।
ऐसे में मुझे गोदान के होरी की याद आ जाती है जो साल दर साल कर्ज के दलदल में ऐसा धंसता चला जाता है कि मौत को बाद भी नहीं उबर पाता। आज भी ऐसे होरियों की कमी नहीं है। दरअसल हम इनकी समस्या बस देख सकते हैं, लिख सकते हैं, बातचीत कर सकते हैं, ना समझ सकते हैं ना झेल सकते हैं।
कुछ लोगों का कहना है कि इसमें सरकार क्या करे, मैं पूछता हूं तो सरकार आखिर है ही क्यों बस लोकतंत्र का पर्व मनाने के लिए?  हर पाँच साल में हम लोकसभा विधानसभा के चुनावों के लिए लाइन लगा के मतदान के लिए खड़े हो जाते हैं तय करते हैं अपना भविष्य कि अब सब बदल जाएगा लेकिन बदलता क्या है ये मेरे लिए एक सवाल ही है, आपके मन में सवाल नहीं उठते क्या या आप सवालों से डरते हैं कि आप पूछेंगे तो आपसे कोई पूछेगा तो डरिए मत सवाल आए तो मुझे भी बताइए...हम साथ पूछेंगे अगली बार................

(अभिषेक)
बाढ़ तो बस झलकी है............
बिहार में बाढ़ से अभी मात्र 253 मौतें ही हुई है, आँकड़ा ज्यादा तो नहीं लग रहा है ना, वैसे भी अगस्त के महीने में मौतें तो होती रहती हैं। सरकार की इसमें क्या गलती है, हमारी तो आदत है हर मामले में सरकार की कमी निकाल कर उसे गरिया देना। अब मुख्यमंत्री हवाई यात्रा कर के डूबते हुए गाँव, खलिहानों को देख तो रहे हैं लेकिन कर क्या सकते हैं अब तैर तैर के लोगों को बचाएंगे क्या?  बाढ़ आपदा के नाम पर लाखों करोड़ों का फंड रीलिज करा सकते हैं, केन्द्र सरकार से मदद मांग सकते हैं वैसे भी प्रधानमंत्री जी उनके अभिन्न मित्र हो चुके हैं तो कोई दिक्कत ही नहीं है वो तो एक कुत्ते की मौत पर भी भावुक होने वाले लोग हैं फिर तो यहाँ 253 जानें हैं।
एनडीआरएफ की टीम जोर शोर से बचाओ कार्य में लगी है, मेरा गाँव डूबा हुआ है मदद के नाम पर गाँव से 5 किलोमीटर दूर एक स्कूल की छत पर 4 एनडीआरएफ के जवान तैनात हैं जो खाना बनाते हैं खाते हैं और केवल शौचालय के लिए नीचे उतरते हैं। अब लोगों को बचाने में अपनी जान थोड़े देंगे।
सड़क वैसे भी जर्जर ही थी, प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना से एक बार बनी थी उसके बाद बस टूटती रही, अब कई जगह से और टूट गई जिसे बाढ़ के बाद लोकल जीप गाड़ी वाले भर के जाने लायक बना देंगे। गाँव की छतों पर एक-आध पैकेट भी गिरे थे जिसे राहत सामग्री कहा जाता है।
बिजली की कौन बात करे मोबाइल के टावर भी बंद थे जिससे किसी से संपर्क नहीं हो पा रहा था। वैसे आप सोच रहे होंगे मैं ये सब क्यों बता रहा हूँ दरअसल ये उभरते हुए उन्नत भारत की तस्वीर है जिसे सबको आँख खोल के देखना चाहिए।
वैसे असली विपदा तो बाढ़ के बाद की है जब सैकड़ों बिमारियाँ जन्म लेंगी। वैसे भी बिहार में 28000 की आबादी पर एक डॉक्टर की उपलब्धता है ऐसे में बिमारी का सामना करना कठिन होगा। फसलें डूब के बर्बाद हो चुकी होंगी तो इसका खामियाजा लोगों को अगले साल भुगतना होगा जब उनके खाने पर संकट आएगा। फसल से होने वाली कमाई पर निर्भर रहने वालों का दैनिक जीवन जिस भयंकर रूप से प्रभावित होगा उसका अनुमान लगाना कठिन है।
ऐसे में मुझे गोदान के होरी की याद आ जाती है जो साल दर साल कर्ज के दलदल में ऐसा धंसता चला जाता है कि मौत को बाद भी नहीं उबर पाता। आज भी ऐसे होरियों की कमी नहीं है। दरअसल हम इनकी समस्या बस देख सकते हैं, लिख सकते हैं, बातचीत कर सकते हैं, ना समझ सकते हैं ना झेल सकते हैं।
कुछ लोगों का कहना है कि इसमें सरकार क्या करे, मैं पूछता हूं तो सरकार आखिर है ही क्यों बस लोकतंत्र का पर्व मनाने के लिए?  हर पाँच साल में हम लोकसभा विधानसभा के चुनावों के लिए लाइन लगा के मतदान के लिए खड़े हो जाते हैं तय करते हैं अपना भविष्य कि अब सब बदल जाएगा लेकिन बदलता क्या है ये मेरे लिए एक सवाल ही है, आपके मन में सवाल नहीं उठते क्या या आप सवालों से डरते हैं कि आप पूछेंगे तो आपसे कोई पूछेगा तो डरिए मत सवाल आए तो मुझे भी बताइए...हम साथ पूछेंगे अगली बार................

(अभिषेक)

Thursday, 23 March 2017

डर आपके सरकार से नहीं लगता साहब आपके शोहदों के कार्यकाल से लगता है

सरकार बदल चुकी है, प्रचंड बहुमत के साथ नई सरकार सत्तासीन हो चुकी है लोगों के नई सरकार में असीम बहुमत के साथ विश्वास व्यक्त किया है, मुख्यमंत्री पद के शपथ के साथ तमाम चैनलों पर चौबीस गुना सात चलने वाली बहस कौन बनेगा मुख्यमंत्री जैसी पकाऊ बहसें खत्म हो गई है।
संसद मे बतौर सांसद आदित्यनाथ ने अपने भाषण में काफी चुटीले अंदाज में कहा था खड़गे जी उत्तर प्रदेश में अब बहुत कुछ बंद होने वाला है। उनकी इस बात का असर तड़ातड़ लिए जाने वाले फैसलों में साफ दिखने लगा है। मतलब साफ है कि ये चुप बैठने वाली सरकार नहीं है वैसे ये भी कहा जा रहा है कि नई बहु का रंग कुछ दिन अच्छा ही लगता है।
एक तरफ जहाँ सरकार के अच्छे कदमों की सराहना होनी चाहिए वहीं दूसरी तरफ सरकार की आड़ में कानून व्यवस्था को चुनौती देते और गुंडागर्दी करते लोगों के समूहों पर भी कड़ी कार्यवाही की जरूरत है। चुनाव के समय ये समूह एक विशेष पार्टी का समर्थन करते हैं और फिर उसकी सरकार बन जाने पर खुलकर धांधली करते हैं जैसे नई सरकार ने इन्हें कानून व्यवस्था हाथ में लेने का लाइसेंस दिया हो। चूंकि चुनाव में ये दल उस पार्टी के समर्थन में होते हैं जो सत्ता में आती है तो सरकार भी इनपर कार्यवाही करने से बचती है। ये किसी एक पार्टी की कहानी नहीं है, हर पार्टी के साथ ऐसे छुटभैये जुड़े रहते हैं। पिछली सरकार के कार्यकाल में भी आए दिन टोल बूथ पर होती लड़ाईयाँ अभी भूली नहीं हैं।

चुनाव में भाजपा वे अपने घोषणापत्र में कहा था कि महिलाओं की सुरक्षा के लिए एंटी रोमियो स्कावयड का गठन करेगी जिसे अब अमली जामा पहनाया जा रहा है। क्या इसका मतलब ये है पहले पुलिस महिलाओं के साथ हुए ऐसे वारदात से अच्छे से नहीं निपटती थी?  एंटी रोमियो स्कावयड में शामिल पुलिस अब लड़कों से अजीबों गरीब सवालात कर रही है जिसमें फटे हुए जींस से लेकर टी-शर्ट के उपर शर्ट का बटन खोल कर भी चलने पर सवाल किए जा रहे हैं। सतीश ने बताया कि वो म्यूजिक से जुड़े हुए हैं और स्टाइलिश दाढ़ी रखते हैं, फैशन के लिए कभी कभी शर्ट खोल के बाइक चलाते हैं कल उन्हें रास्ते में रोक कर सवाल किए गए जो अजीब था। ऐसे ही कई शहरों से अपने बहन को कॉलेज से लाने गए लड़कों को भी चेतावनी दी गई तो कहीं उठक-बैठक भी कराया गया। डर है कि ये एंटी रोमियो स्क्वायड कुछ तथाकथित हिन्दू संस्कृति रक्षक दलों की तरह कहीं साथ बैठे कपल से आपस में राखी ना बंधवाने लगे या मारपीट ना करने लगे। यहाँ तक की बनारस के शहीद उद्दान में अकेले बैठे लड़कों को भी बुला कर चेतावनी दी गई।

 बनारस में कल कई शराब की दुकानों को बंद करने को लेकर बवाल काटा गया। आमतौर पर अखबारों में आया कि ये महिलाओं के द्वारा किया गया हंगामा था जिसमें शराब की दुकानों पर तोड़ फोड़ की गई हो सेल्समैन को मारा पीटा गया, शराब की बोतलें फेंक दी गई लेकिन कुछ लोगों से बातचीत करने पर पता चला कि इसमें कुछ युवक भी शामिल थे और कई जगह के डिपार्टमेंटल स्टोर पर दुकानों के अंदर टेबल कुर्सीयाँ तोड़ दी गई और बाकि सब्जियाँ, पनीर जैसे आइटम भी फेंक दिए गए। बाहर पुलिस चुपचाप खड़े तमाशा देख रही थी।

अगर शराब बंद ही करना है तो इसके लिए एक कानूनी प्रावधान लाना होगा ऐसे हंगामें कर और अपनी नौकरी कर रहे कर्मचारी को पिटने के लिए लोगों पर कानूनी कारवाई होना चाहिए। ठीक ऐसा ही बूचड़खानों के साथ भी है विदित हो कि पिछले साल कई जगह पशुओं को लेकर जा रहे ट्रक वालों को कुछ लोगों ने घेर कर मार दिया था।

बात ठीक है जो चीजें गलत हैं वो बंद हो लेकिन ये कानूनी दायरे में ही हो वरना ना गुंडाराज ना भ्रष्टाचार का नारा देने वाली सरकार के राज में ही गुंडाराज को बढ़ावा मिलने लगेगा।

(अभिषेक)


Friday, 16 December 2016

निर्भया तुम नहीं हो लेकिन तुम्हारी चीखें अभी भी हैं....


16 दिसंबर 2012 आज चार साल हो गए, मैं दिल्ली में हीं था उस समय जब इंसानियत को अंदर तक तोड़ देने वाली और मनुष्यता को पशुता में बदल देने वाले उस भयावह घटना को अंजाम दिया गया था।
युवाओं मे इस घटना को लेकर बेहद आक्रोश था, जंतर –मंतर पर धरने दिए जा रहे थे, महिला-उत्पीड़न के खिलाफ कानून बदलने और ऐसे हैवानों को फाँसी देने की बात की जा रही थी। ऐसा लग रहा था जैसे ये लडकों से अभद्रता समाप्त होने का काल है, इसके बाद ना लड़कियों से छेड़खानी की घटना सामने आएगी, ना बलात्कार होंगे, ना कोई लड़की जलाई जाएगी, ना उन पर कोई कमेंट हुआ करेगा, ना कहीं दहेज के नाम पर उन्हें जलाया जाएगा और ना ही कोई दुर्वयवहार होगा।
लेकिन 4 साल बीत गए और बदलाव के नाम पर हुआ क्या है, हाल में ही ऑटो से लौटते समय एक लड़की से हुई अभद्रता को मैंने फेसबुक पर शेयर किया उसके बाद मुझे पता चला कि वो तो बहुत छोटी बात थी। फेसबुक पर मेरे पोस्ट को पढ़ने के बाद कुछ लड़कियों ने बताया मुझे कि इससे कही ज्यादा बड़ी बात रोज हमारे आस पास हो रही हैं यहाँ तक की हर लड़की को अपने जीवन में ऐसे हादसों से गुजरना पड़ता है। एक लड़की की दास्तान शेयर कर रहा हूँ जिसे सुन के सोचने पर मजबूर होना पड़ता है कि हम कितना बदले हैं.........

मैं 6ठी क्लास में थी जब घर पर मुझे पढ़ाने के लिए ट्यूटर ढूंढ़ा जा रहा था, चूंकि मेरे पापा मुझे बहुत प्यार करते थे इसलिए हमेशा मेरा ख्याल रखते थे इसलिए नहीं चाहते थे कि मैं बाहर पढ़ने जाऊँ। मुझे पढ़ाने के लिए उन्होने अपने एक दोस्त के बेटे को बोल दिया था, कि वो घर का ही लड़का है ग्रेजुएशन कर रहा है, पढ़ने में तेज है तो अच्छे से पढ़ा भी लेगा और कुछ पॉकेटमनी भी उसे मिल जाएगी।
शुरू शुरू में वो बहुत अच्छे थे, मुझे मानते भी बहुत थे, पढ़ाते भी अच्छा थे, मेरे लिए चॉकलेट्स भी लाते थे, सबकुछ अच्छा चल रहा था फिर कि मुझे महसूस हुआ कि उन्होने अपने पढ़ाने की जगह बदल दी थी, पहले जो वो सामने बैठ के पढ़ाते थे वो अब बगल में बैठ के पढ़ाने लगे थे और कॉपी किताब लेने देने के बहाने मुझे छूने भी लगे थे। मुझे आज ये एहसास हो रहा है जबकि उस समय मुझे पता भी नहीं चल रहा था कि मेरे साथ क्या हो रहा है।
एक दिन मम्मी बाहर गई हुई थी, पापा स्कूल से लौटे नहीं थे, भैया भी ट्यूशन पढने गया था। भैया मुझे पढ़ाने आए (हाँ, मैं उन्हें भैया ही कहती थी) पूछा कि कहाँ हैं सबलोग ?  मैंने बताया सबके बारे में, फिर उन्होंने पानी माँगा, मैं किचेन से जा के पानी ले के आई, उन्होंने पानी का ग्लास ले के टेबल पर रख दिया और मुझे पकड़ लिया और बेड पर लेकर चढ़ गए। तब मुझे समझ ही नहीं आया ये अचानक क्या हो रहा है लेकिन जो भी हो रहा था वो मुझे बहुत बुरा लग रहा था। मैं रोने लगी और थोड़ी देर में चिल्लाने लगी, जब उन्हें लगा कि मेरी आवाज घर के बाहर जा रही होगी तो  उन्होंने मुझे छोड़ा और मुझे समझाने लगे कि किसी से बताना मत वरना लोग मुझे जान से मार डालेंगे, मैं तो बस खेल रहा था, मैं रोज तुम्हारे लिए चॉकलेट लाया करूँगा, तुम किसी से कुछ मत कहना।
मैं धीरे-धीरे चुप हो गई डर भी लग रहा था कि सच में भैया को कोई मार ना डाले, फिर मुझे चुप करा कर भैया चले गए, मैंने भी ये बात किसी को नहीं बताई, भैया आते थे मेरे से नजर नहीं मिला पाते थे, मुझे भी अब उनसे डर लगने लगता रहता था औऱ पढ़ने में भी मन नहीं लगता था।
कुछ दिनों के बाद मैंने ये बात अपने बड़े भाई को बताई वो भी तब छोटा ही था  फिर भी उसने समझा औऱ पापा से बात कर के कहा कि इसे अब मैं ही पढ़ाऊँगा टाइम निकाल के आप भैया को आने से मना कर दीजिए।
इस घटना ने जैसे मेरे जीवन से प्रतिरोध की क्षमता ही छीन ली, स्कूल-कॉलेज में लड़के कमेंट कर के चले जाते थे और मैं चुप ही रह जाती थी, अब भी चुप रहती हूँ पर आपका पोस्ट पढ़ा तो लगा कि आपको बताऊँ जब इतनी छोटी घटना से प्रभावित  हैं तो सोचिए लड़कियाँ अपने जीवन में रोज होने वाले घटनाओं से कितना प्रभावित होंगी, और तो और वही आदमी अब किसी बड़ी कंपनी में काम कर रहा है,जब सामने आता है तो मन घृणा से भर जाता है लेकिन कुछ नहीं कर पाती। निर्भया आंदोलन ने ही क्या बदल दिया हर जगह रोज जाने कितनी निर्भया को मानसिक प्रताड़ना से गुजरना पड़ता है ये कमेंट करने वाले नहीं समझेंगे और क्या कहूँ  समझिए अब तो आदत ही हो गई है तो आप भी इतना मत सोचिए।
मैं खामोश था पलकों के कोरों पर आँसू थे, लग रहा था कि मैं भी इसी समाज का हिस्सा हूँ औऱ इन सब घटनाओं के लिए मैं भी समान रूप से जिम्मेदार हूँ तो बस तुमसे यही कहना चाहता हूँ निर्भया तुम नहीं हो लेकिन तुम्हारी चीखें अब भी कानों में गूंज रही है, सवाल कर रही हैं कि मेरे बाद क्या बदला मेरे पास उसके सवालों के जवाब में बस आँसू हैं, क्या करूँ सॉरी भी तो नहीं बोल सकता क्योंकि कोई सॉरी बोलना भी  तुम्हारे साथ धोखा करना है क्योंकि सिर्फ सॉरी बोलने से का मतलब कुछ बदलना नहीं होता।
रोज ऐसी घटनाएं हमारे आस-पास हो रही हैं और रोज जाने कितनी निर्भया का शिकार हो रहा है लेकिन बदलाव के नाम पर नील बटे सन्नाटा है, तुम तो सब देख रही होगी तुम्हें क्या बताना बस खामोशी से देखते रहो और कोसते रहो इस समाज को।


(अभिषेक)

Tuesday, 15 November 2016

नोटबंदी- परेशान जनता के बीच देश को आगे ले जाने की कवायद


500-1000 के नोटों की बंदी ने सामान्य तौर पर जीवन में अस्तव्यस्तता की स्थिति उत्पन्न कर दी है। तमाम बैंकों और एटीएम के आगे लगती हुई लाइनें इसके गवाह हैं। काफी जगह मार-पीट और भगदड़ जैसी स्थिति भी उत्पन्न हुई है लेकिन ज्यादातर जगह लोग लाइन में लग रहे हैं और पैसे निकाल रहे हैं। सरकार के खिलाफ गुस्से और आक्रोश के साथ-साथ अच्छा खासा समर्थन भी है जो सरकार के लिए उत्साह बढ़ाने वाला है। ये अलग बात है कि इस योजना को लागू करने से पहले कुछ जरूरी कदम उठाए जा सकते थे, जिससे यह बात बाहर आए बिना कि नोट बंद होने वाले हैं योजना को अच्छे से लागू किया जा सकता जैसे-

1.       माइक्रो एटीएम की व्यवस्था पहले से की जा सकती थी जिसे अब लगाने की बात की जा रही है इसके लिए कुछ बताने की जरूरत भी नहीं थी क्योंकि ग्रामीण इलाकों में वैसे भी एटीएम का अभाव है।

2.       यूं भी बैंकों के बहुत सारे एटीएम खराब रहते हैं या बहुतों में पैसे नहीं रहते तो आरबीआई के द्वारा एक गाइडलाइन जारी कर इन बैंकों को इन्हें सुचारू रुप से चलाने के निर्देश दिया जा सकता था, इसके लिए भी नोटबंदी की खबर बताने की आवश्यकता नहीं थी क्योंकि एटीएम अब हमारे दैनिक जीवन का हिस्सा बन चुके हैं जिनके बंद रहने से परेशानी होती है।

3.       हवाईजहाज से नोट पहुँचाने की व्यवस्था जो दो दिन बाद शुरू हुई वो घोषणा के तुरंत बाद से भी की जा सकती थी ताकि बैंको में नोट कम ना पड़ें।

4.       एटीएम तक नोट पहुँचाने वाले एजेंसियों की संख्या में वृद्धि कर इस समस्या को कम किया जा सकता था।


5.       2000 के बदले 500 के नए नोट पहले बाजार में आने से छुट्टे की समस्या पर काबू पाया जा सकता था।
तो ये कुछ जरूरी उपाय पहले भी किए जा सकते थे जो अब किए जा रहे हैं। इतना होने के बावजूद ये निर्णय सही सोच से लागू किया गया तो कुछ सामान्य फायदे हो सकते हैं बड़े बदलाव की बात अलग है जैसे-
1.       काफी संख्या में देश के गाँवों में समृद्ध लोग भी अपने प्रभाव से या पैसे देकर खुद को बीपीएल की लिस्ट में शामिल करा लेते हैं अब अगर उनके अकाउंट में ज्यादा रूपए पाए जाएंगे तो सरकार उनसे सवाल कर सकती है कि वो कैसे बीपीएल में हैं जबकि उनके पास पर्याप्त पैसा है।

2.       देश में बेइमानों की कमी नहीं है और घूस देकर यहाँ लगभग हर काम कराया जा सकता है जैसे बहुत सारे सरकारी नौकरी वाले, व्यापारी, प्राइवेट नौकरी वालों के बच्चे घूस देकर अपना मात्र 6000 का इन्कम सर्टिफिकेट बनवा लेते हैं और स्कॉलरशिप उठाते हैं और जरूरतमंद छात्र इससे वंचित रह जाते हैं। ऐसे लोगों के अकाउंट को चेक कर इस पर लगाम लगाया जा सकता है और उन लेखपालों को भी दंडित किया जा सकता है जो ऐसे जाली सर्टिफिकेट बनाते हैं। ये अलग बात है कि ये इतना आसान नहीं होगा लेकिन इतना मुश्किल भी नहीं होगा जितना अभी का फैसला था।

3.       घूस लेकर हजारों करोड़ की संपत्ति जमा करने वाले लोग अब इतना खूल कर घूस नहीं लेंगे और लेंगे भी तो शायद घर में जमा कर के नहीं रखेंगे और ना बैंक में जमा कर पाएंगे। लेकिन छोटे नोटों के रुप में घूस लेने की संभावना से इनकार भी नहीं किया जा सकता क्योंकि आदत सुधरती नहीं है इतनी जल्दी।

4.       देश में इन्कम टैक्स भरने वालों की संख्या में इजाफा हो सकता है क्योंकि यहाँ के जनसंख्या का बहुत कम अनुपात टैक्स का भुगतान करता है। लोग साल में 22 लाख की खरीदारी करते हैं लेकिन वार्षिक आय 5 लाख से कम ही दिखाते हैं।
5.       भविष्य का तो नहीं पता लेकिन अगले एक-दो साल पैसा घर में दबा के रखने की प्रवृत्ति पर लगाम लगेगा लोगों की क्रय क्षमता कम होने से मंहगाई के भी कम होने की संभावना है।

कुछ और भी जरूरी घोषणाएं कर प्रधानमंत्री लोगों का विश्वास मजबूत कर सकते हैं जैसे जिन कारपोरेट घरानों के पास बैंको के हज़ारों करोड़ बकाया है उनके उपर दबाव बनाया जाए कि वो कर्ज चुकाएं या उनके नाम सार्वजनिक किए जाएं, राजनीतिक दलों को उनके चंदे का हिसाब देने के लिए कानून बनाया जाए और उन्हें आरटीआई के दायरे के अंदर लाया जाए।

ये अलग बात है कि इसके लिए ढृड़इच्छाशक्ति चाहिए जो कि उन्होंने नोटबंदी के फैसले को लेकर दिखाया है।
उम्मीद है कि अभी चलती हुई परेशानी कुछ अच्छा परिणाम लेकर आए वरना हमेशा की तरह अगर परिणाम ढ़ाक के तीन पात हुए तो जनता एक बार फिर ठगी जाएगी और तमाम सवालों के लिए प्रधानमंत्री को तैयार रहना होगा।

(अभिषेक)


Saturday, 12 November 2016


सवाल पर इतना कोहराम क्यों?


आमतौर पर सवाल पूछना हमारे जीवन का अभिन्न अंग है। नीजि तौर पर हम अपन जीवन में कदम कदम पर सवाल करते हैं और या तो जवाब से संतुष्ट होकर आगे बढ़ते हैं या तो उचित जवाब नहीं मिलने पर झल्लाते हैं।
मैं भी बचपन से आज तक अपने क्लास में सवाल पूछने के कारण ही चर्चित रहा हूँ और दोस्तों के बीच मेरी प्रतिष्ठा भी इसी कारण रही है। बी.टेक के दौरान तो हालत ये थी कि जब दोस्तों का क्लास में मन नहीं लगता था तो वो कहते थे कि अबे मिश्रा टीचर को किसी सवाल में उलझाओ ना तब तक हम गप्पे मारते हैं। टीचर ने भी हमेशा यथासंभव अपने उत्तर से संतुष्ट ही करना चाहा जिसके लिए मैं उनका आभारी हूँ।
एक लोकतांत्रिक देश में सवाल उस लोकतंत्र की आत्मा को जिंदा रखता है शायद तभी संसद और विधानमंडलों में हर सांसद और विधायक को सवाल पूछने का अधिकार दिया गया है। हमारी किसी विधायक या सांसद में आस्था औप विश्वास रहता है तभी वोट देकर उसे चुनते हैं और ऐसे ही सरकार बनती है तो क्या उन्हें चुनने के बाद हम उनसे सवाल का अधिकार खो देते हैं?

वर्तमान के राजनीतिक परिदृश्य में सरकार से किए जाने वाले सवाल को बुरी तरह उलझाया जा रहा है मसलन हर सवाल को देशभक्ति की भावना से कैसे जोड़ कर देखा जा रहा है, अगर सरकार के हर फैसले के आप समर्थन में हैं तो आप देशहित में हैं वरना देश छोड़ कर चले जाइए। क्या ये किसी सवाल का जवाब हो सकता है कि देश छोड़ कर चले जाओ, ये सवाल ही हैं जिसने UPA सरकार के तमाम घोटालों का पर्दाफास किया तब तो ऐसे ऊंगलियाँ नहीं उठाई जाती थी, अब अगर अखलाक को भीड़ ने मार दिया और आपने सवाल किया तो आप देश के खिलाफ हैं, रेलवे के बढ़ते किराए पर सवाल किया तो आप देश के खिलाफ हैं, फर्जी इनकाउंटर पर सवाल किए तो आप देश के खिलाफ हैं, अरूणाचल-उत्तराखंड के सवाल पर कुछ कहा किए तो आप देश के खिलाफ हैं, गैस सब्सिडी खत्म होने पर सवाल किया किए तो आप देश के खिलाफ हैं, OROP पर चल रहे विवाद पर सवाल किया किए तो आप देश के खिलाफ हैं, और अब 500-1000 के नोट बदलने में हुए परेशानी पर सवाल करो तो भी आप देश के खिलाफ हैं, इतना ही नहीं ऐसे तमाम मामले हैं जहाँ आपको तपाक से देश के खिलाफ कह दिया जाएगा।

जहाँ तक सेना की बात है जिसपर सवाल उठाना आजकल अपराध हो गया है तो क्या सेना में भ्रष्टाचार नहीं होते, मैं अपने गाँव से सेना में गए ऐसे तमाम लोगों को जानता हूँ जिनका मेडिकल दलालों को पैसा देकर क्लियर हुआ है और आज भी होता है, आए दिन इसके लिए भी गिरफ्तारियाँ होती हैं। विदित हो कि अगस्टा वेस्टलैण्ड मामले में पूर्व उप वायुसेना प्रमुख जे एस गुजराल औऱ एस पी त्यागी को उनकी संदिग्ध भूमिकाओं के लिए सीबीआई ने तलब भी किया था।

ऐसा नहीं है कि मैं सेना का बलिदान कम आँक रहा हूँ ये सही है कि हम उनके वजह से महफूज हैं और घरों में चैन की नींद सोते हैं लेकिन कम से कम अपने राजनीतिक फायदे के लिए उनके बलिदान पर तो रोटियाँ ना सेकी जाएं। पूर्व सेना प्रमुख वी. के. सिंह आज सांसद हैं तो क्या उनसे उनके क्षेत्र की जनता सवाल करे कि इन 5 सालों में आपने क्षेत्र के विकास के लिए क्या किया तो वो ये कह कर टाल देंगे कि वो सेना से हैं उन्होंने सीमा पर देश के काफी कुछ किया है इसलिए उनसे सवाल नहीं होना चाहिए।

यही सेना से रिटायर होने के बाद जवान तमाम सिक्यूरिटी एजेंसियों में काम करते हैं तो भी क्या आप उनके साथ ऐसा ही व्यवहार करते हैं। मेरे कॉलेज हॉस्टल के वार्डन भी हमेशा सेना से रिटायर लोग ही रहे हैं अभी सेना का नाम जपने वाले मेरे कुछ मित्रों का तब उनके साथ कैसा व्यवहार था ये आज भी याद है मुझे । और ये तर्क कि आप दो दिन लाइन में खड़े नहीं हो सकते और सेना आपके लिए हमेशा खड़ी रहती है याद रखिएगा भविष्य में आप पर ही भारी पड़ने वाला है जब आपके हर परेशानी को यही कह कर टाल दिया जाएगा जैसे कभी बिजली की किल्लत हो गई जो कि आम है अपने देश में तो सरकार यही कहा करेगी कि सेना 24 घंटे बिना बिजली के खड़ी रहती है और आप बिना बिजली के नहीं रह सकते, ट्रेन में टिकट नहीं मिलने पर भी कहा जाएगा कि सेना देश के लिए हमेशा खड़ी रहती है और आप एक दिन की यात्रा खड़े होकर नहीं कर सकते, ऐसे ही आपके हर सवाल जिसका जवाब सरकार के पास नहीं होगा ऐसे तर्कों से आपका मुँह बंद कर दिया जाएगा।

तो किसी सवाल को बस ये कह कर खारिज़ देना कि ये देशहित के खिलाफ है मेरे अनुसार तार्किक नहीं क्योंकि सवाल हैं तो लोकतंत्र है और ये हमारा अधिकार भी है और मैंने पढ़ा भी है कि

अधिकार खोकर बैठ जाना यह महा दुष्कर्म है
न्यायार्थ अपने बंधु को भी दंड देना धर्म है

(अभिषेक)





Thursday, 10 November 2016

500-1000 की बंदी और जीवन का यथार्थ


मैं गाँव में था और छठ के अवसर पर नाटक का मंचन चल रहा था जब ये ब्रेकिंग न्यूज सामने आई कि 500 और 1000 के नोट अब नहीं चलेंगे, पहले तो मुझे भी विश्वास नहीं हुआ कि अचानक ऐसा कैसे हो सकता है लेकिन अब गाँव में भी इंटरनेट का इस्तेमान करने वाले युवा हो गए हैं तो खबर की प्रमाणिकता भी मिली।

सुबह तक गाँव में ये खबर पूरी तरह फैल गई थी लेकिन किसी को समझ नहीं आ रहा था कि ये क्या हो रहा है। दरअसल छठ के अवसर पर बाहर से कमा के घर आने वाले अपने साथ 500 और 1000 के नोट ही लेकर आते हैं ताकि रास्ते में परेशानी ना हो और घर, गृहस्थी के तमाम काम वो घर आने के बाद उन पैसों से कराते हैं लेकिन अचानक हालात ऐसे हो गए हैं पैसा रहते हुए भी सारे गरीब हो गए हैं।

मैं ये नहीं कह रहा है कि ये गलत है, हो सकता है काला धन पर लगाम लगाने के लिए ये अत्यावश्यक हो लेकिन भारत जिसे गाँवों का देश कहते हैं वहाँ इसका क्या परिणाम हुआ है उससे अवगत करा रहा हूँ जो कि मैं देख के आया हूँ।

मेरे गाँव पजिअरवा प.चम्पारण बिहार से 12 किलोमीटर दूर सुगौली जंक्शन है जहाँ से लोगों को बाहर जाने के लिए जरूरी रेलगाड़ियाँ मिलती हैं। यहीं पर तमाम बैंक और एटीएम भी हैं, गाँव से सुगौली आने के लिए जीप मिलता है जिसका किराया 25 रूपए है। सुगौली में मिले मेरे गाँव के गिरिन्द्र मिश्र ने बताया कि वो लुधियाना रहते हैं और छठ मे गाँव आए हैं। उनके पास 50 रूपए थे और बाकि 500 को नोट है उन्हें भागलपुर जाना था जीप के 25 देने के बाद अब बस 25 बचे हैं, टिकट काउंटर पर कहा जा रहा है कि खुल्ला लेकर आओ तब टिकट मिलेगा वो परेशान हैं कि भागलपुर कैसे जाएँ।

गाँव में ही दोपहर को मेरे एक काका के यहाँ एक आदमी आया जिसने बताया कि पत्नी के इलाज के लिए उसने सूद पर 5000 रूपए लिए थे जिसमें 500 और 1000 के नोट थे जिसे लेकर वो इलाज के लिए सुगौली गया था लेकिन डॉक्टर ने पहले तो 100 के नोट नहीं होने से देखने से मना कर दिया लेकिन लाख मिन्नत करने के बाद देखा भी तो दवाई के दुकान वाले ने दवा देने से मना कर दिया क्योंकि उसके पास 500, 1000 के ही नोट थे। जब वह सूद वाले को पैसा वापस करने गया तो उसने भी नहीं लिया कि वो इसका जिम्मेदार नहीं है।
एक आदमी ने मुजफ्फरपुर से फोन किया कि उसके पास बस 500 हैं सारे एटीएम बंद हैं और बस वाला पैसा नहीं ले रहा है वो क्या करे कोई जान पहचान हो तो मदद करे। ऐसे बहुत सारे लोग हैं जो भयंकर रूप से परेशान हैं, मैं खुद जुगाड़ लगा कर कहीं से 1000 के चेंज लाया तो 500 पिता जी को दिए कि दो-चार दिन काम चलाएं और 500 ले कर बनारस आया।

ऐसे ही जाने कितने लोग अस्पताल, स्टेशन और कई जगहों पर परेशान घूम रहे हैं। अपनी परेशानियों को बताने का मतलब मोदी या सरकार का विरोध ही नहीं होता, ये सारी परेशानियाँ आपके परिवार को भी झेलनी पड़ रही होंगी, उम्मीद है देश के लिए इतना करना पड़ता है टाइप तर्क नहीं देंगे क्योंकि मैं यहाँ किसी का विरोध समर्थन नहीं मैं भी अपने मन की ही बात कर रहा हूँ जिसका मुझे भी हक है शायद।

(अभिषेक)