Friday, 2 July 2021


फिल्म समीक्षा- राधे

राधे एक अति डिस्टर्बिंग मूवी है इसे देखना परमाणु परीक्षण से भी भी ज़्यादा ख़तरनाक हो सकता है।

फ़िल्म में एक ही किरदार है सलमान और बाकि सब भाई के मनोरंजन के लिए है।

मूवी खत्म होने की रफ़्तार बुलेट ट्रेन से भी तेज़ है इस तरह भाई सरकार का सपोर्ट करते हुए दिखते हैं कि बुलेट ट्रेन ना सही बुलेट मूवी सही।

इस फ़िल्म में रियल लाइफ़ की तरह रील लाइफ़ में भी भाई लोगों पर गाड़ी चढाने का शौक पूरा करते हुए दिख हैं।

फ़िल्म में सबके अधिकारों का ख़्याल रखते हुए सबको अपने हिसाब से डायलॉग बोलने और एक्टिंग करने की छूट दी गई है इसलिए जिसको जो मन कर रहा है वो कर रहा है।

हर किरदार फ़िल्म में कुछ ना कुछ कर रहा है परंतु क्या

करना चाहता है वो स्वयं नहीं जानता है।

सामान्य हालात में ये फ़िल्म देखना आपको पागल कर सकता है इसलिए अपने किसी ऐसे दोस्त के साथ इसे देखें जिसने इस दुनिया से उम्मीद रखनी छोड़ दी हो।

समय के साथ खराब एक्टिंग की मिसाल कैसे पेश कर सकते हैं ये कलाकारों को सलमान से सीखना चाहिए।

जीवन से हताश निराश लोगों के लिए ये फ़िल्म टॉनिक का कार्य करती है कि जब ऐसी फ़िल्में चल सकती हैं तो जीवन क्यों नहीं चल सकता।

बाकि ये मूवी रेटिंग और आलोचनाओं से परे है ट्रेलर से ही पता

चल गया था कि इसको देखने में रिस्क है तो सवारी सामान की खुद ज़िम्मेदार है आप चाहें तो देश के नाम खुला खत लिख कर भी देख सकते हैं बाकि ये फ़िल्म इसलिए भी देखनी चाहिए ताकि पता चल सके कि कैसी फ़िल्में नहीं देखनी चाहिए।



Friday, 20 April 2018


एक बच्ची के साथ ऐसा कोई कैसे कर सकता है..........


रात को दो बजे लाइट बंद करने के बाद सोने के लिए जैसे ही बिस्तर पर सोने के लिए आया देखा मोबाइल पर एक दोस्त का कॉल आ रहा था, चूंकि रात के दो बज रहे थे इसलिए थोड़ी चिंता का हो जाना स्वभाविक ही था, मैंने कॉल उठाया तो उधर सिसकती सी आवाज के साथ एक सवाल आया कि 8 साल की बच्ची के साथ ऐसा कोई  कैसे कर सकता है, वो तो बता भी नहीं सकती कि उसके साथ क्या हुआ, उसे कितना दर्द हुआ होगा, वो रो रही थी और लगातार यही बात दुहरा रही थी।

मैं खामोश चुपचाप उसे सुन रहा था, समझ नहीं आ रहा था उसके इस सवाल का क्या जवाब दूँ कि ऐसा कोई कैसे कर सकता है वो भी 8 साल की बच्ची के साथ, मैं क्या बोलता ऐसा क्यों हुआ, मैं कुछ भी जवाब देने की स्थिति में नहीं था, वही रटारटाया सा जवाब था मेरे पास हम दरिंदे हो गए हैं क्या करें।

वो रोती रही और रोते-रोते उसने बताया कि मुझे डर लग रहा है कि उसकी भतीजियों के साथ भी ऐसा कुछ ना हो, वो दोनों भी बच्ची हैं रोज़ दोनों स्कूल जाती हैं, कही कुछ हो गया तो। मेरे साथ तो घर में ही ऐसा हुआ जब मैं बहुत छोटी थी, मैं किसी को नहीं बता पाई, आज मुझे सब याद आ रहा है कि मेरे साथ क्या हुआ था, मुझे डर लग रहा है कि उनके साथ कुछ ऐसा हुआ तो, किसी ने उन्हें जबरदस्ती छुआ तो क्या वो भी किसी को नहीं बताएंगी जैसे मैंने किसी को नहीं बताया।

हमारी गलती क्या है? क्या लड़की होना हमारी गलती है? मेरे पास उसके सवालों का कोई जवाब नहीं था, मैं उसको क्या दिलासा देता क्या समझता कि चिंता नहीं करो कल से ऐसा कुछ नहीं होगा, कल से अखबार के किसी पन्ने पर किसी बलात्कार की खबर नहीं छपेगी, कल से कोई किसी लड़की को अनैतिक रुप से नहीं छुएगा, कल से किसी घर में खुल के बेटियां बता सकेंगी कि हां उसके साथ कुछ गलत हुआ है।

वो इतनी देर तक रोती रही कि मैं झल्ला गया और उसे चुप कराने के बजाए उस पर चिल्ला बैठा लेकिन ये चिल्लाहट उस पर नहीं खुद पर थी, अपनी बेबसी पर थी कि हर रोज़ की तरह सुबह अखबार के पन्ने पलटते हुए ऐसी कई खबरें दिख जाएंगी, फिर अखबार बंद होने के साथ ये खबरें भी दिमाग के किसी कोने में दब जाएंगी। निर्भया से लेकर आसिफा तक यही हो रहा है आगे भी होते रहेंगे, कई कैंडल मार्च निकालने बाकी हैं तैयार रहिए हम ऐसे ही हैं।

Saturday, 14 April 2018




हम गिरे हुए लोग हैं हमारा कोई ईमान धर्म नहीं.



जी हाँ ये बात ये बात मैं पूरे होशोहवास में कर रहा हूँ। हम डिजर्व ही नहीं करते किसी भी धर्म को पूजना क्योंकि मैंने तो बचपन से यही सुना है और पढ़ा है कि मजहब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना लेकिन हम वही कर रहे हैं, भले खुद कर रहे हों या किसी के इन्फ्लुएंस में आ के लेकिन यही सच है वरना दुनिया का कौन सा ऐसा धर्म है जो बलात्कार को जायज मानता हो या धर्म की आड़ में किसी बलात्कारी को सपोर्ट करता हो।

मैंने जब पढ़ा कि आसिफा के कातिलों को बचाने के लिए वकीलों ने ऐसा हंगामा किया किया कि पुलिस को चार्जशीट दायर करने में 6 घंटे लग गए तो मुझे ये लगा कि हम किस युग में जी रहे हैं? हम क्या कर रहे हैं? क्या सारे सवाल सरकार से होंगे, सिस्टम से होंगे, क्या आपकी औकात है कि आप खुद से सवाल कर सकें कि हम क्या कर रहे हैं।
मैं पूरे होशोहवास में ये बात कर रहा हूँ धर्म के नाम पर हंगामा करने वालों से कि मैं धर्म की कोई ठोस परिभाषा पूछूं कि धर्म क्या है तो कोई बता पाएगा। ये महज संयोग की बात है कि मैं हिन्दू ब्राह्मण परिवार में जन्मा। मैं दलित हो सकता था, मैं मुसलमान हो सकता था, मैं ईसाई, यहूदी, जैन, बौद्ध कुछ भी हो सकता था लेकिन क्या वो मेरा चुनाव होता?  ऐसा होता तो सब समाज के सबसे उपरी पायदान में जन्म लेना चाहते। क्या अभी जो मैं स्वतंत्र रूप से लिख रहा हूँ यही दलित होने पर लिख सकताक्या आत्मविश्वास को भी जाति,धर्म का मोहताज होना चाहिए?

क्या हिन्दू के साथ हुआ बलात्कार मुसलमान के साथ हुए बलात्कार से अलग होता है, क्या किसी मुसलमान की चीखें हिन्दू लड़की की चीखों से कम है, क्या इन चीखों को धर्म के आधार पर विभाजित किया जा सकता है?
हम क्या कर रहे हैं हम क्यों कर रहे हैं कभी पूछा है खुद से अगर आसिफा आपकी बेटी होती (भगवान ना करे ऐसा हो) तो आप ऐसा ही करते।

ये कैंडल मार्च, ये सोशल मीडिया पर जस्टिस फॉर आसिफा चला के कुछ हासिल नहीं होगा। लड़ना है तो अपने परिवार से लड़िए अगर वो हिन्दू मुसलमान में फर्क करता हो, लड़िए अगर वो बेटे के मुकाबले बेटी को कम आजादी देता हो, लड़िए अगर वो किसी और जाति के चाय पीने के लिए अलग ग्लास और खाने के लिए अलग थाली रखता हो।

इतनी जल्दी कुछ नहीं बदलेगा क्योंकि हम भी धारा के साथ उसी में शामिल हो जाते हैं और वही मानते हैं जो हमारा परिवार हमारा समाज आज तक मानते आया है लेकिन अब आपको तय करना है कि आप क्या चाहते हैं।
नारी का अपमान तो महाभारत काल से होता आया है लेकिन वहां भी कोई कृष्ण था लेकिन अब ये आपको तय करना है कि मौका मिलने पर आप दुशासन बनेंगे या कृष्ण?

Tuesday, 26 December 2017

लड़का-लड़की एक दूसरे को जानते थे..........

अक्सर किसी छेड़खानी, लड़की पर तेजाब फेंका जाना, सरे-राह कमेंटबाजी या ऐसा कोई मामला जिसमें लड़के द्वारा लड़की को शारीरिक या मानसिक रूप से प्रताड़ित किया जा रहा हो और पुलिस में शिकायत की जाए तो पहला सवाल यही होता है क्या लड़का-लड़की एक-दूसरे को जानते थे, चलो मान लेते हैं ये पूछना जरूरी है लेकिन अगर लड़का-लड़की एक-दूसरे को जानते थे तो क्या लड़के को ऐसा कुछ भी करने का अधिकार मिल जाता है? क्या पुलिस के लिए बस इतना काफी होता है कि बस लड़का-लड़की एक दूसरे को जानते थे इसलिए मामले की जाँच-पड़ताल नहीं की जाए, उस लड़के को नहीं पकड़ा जाए, उसे सजा ना दी जाए, जमानत पर छोड़ दिया जाए ताकि वो उस लड़की को फिर से टॉर्चर कर सके।
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अभी एक खबर पढ़ी कि लड़के ने लड़की को तीन गोलियां मारी, लड़की पीएमसीएच में भर्ती है और पुलिस का बयान है कि लड़का-लड़की एक दूसरे को जानते थे और लड़की के होश में आने के बाद पूछताछ कर आगे की कारवाई की जाएगी। लड़की इंटर की छात्रा है लड़का उस पर शादी करने के लिए दबाव बना रहा था, इससे पहले भी लड़का, लड़की के घर के घर पर गोली चला चुका था। उसने लड़की को धमकी दी थी कि अगर वो मिलने नहीं आएगी तो उसके माँ औऱ भाई को गोली मार देगा। इस वजह से लड़की को बाहर उससे मिलने आना पड़ा और शराब के नशे में धुत लड़के ने उसे गोली मार दी।

मुख्यमंत्री महोदय मुझे नहीं लगता आपके द्वारा चलाए जा रहे किसी भी योजना का कोई फायदा हो रहा है शराबबंदी है लेकिन शराब में धुत लड़के ने उसे सरे-आम गोली मार दी, बाल-विवाह रोकने की आप बात करते हैं लेकिन जो लड़कियां बाल से अब व्यस्क हो चुकी हैं उनके सुरक्षा की कोई जिम्मेदारी आपकी और प्रशासन की है की नहीं और इसमें भी ये बात तो आपके राजधानी पटना की है तो अन्य जगहों पर हालात क्या होंगे इसका अनुमान लगाना इतना मुश्किल नहीं है।
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अब बात लड़कों के मानसिकता की, वो पता नहीं किस दुनिया में जी रहे हैं, ये समझना क्या इतना मुश्किल है लड़की आपकी जागीर नहीं है कि आपकी तरह उसे भी अपने लिए कुछ भी चुनने की स्वतंत्रता संविधान और कानून ने दी है। आप जब रिलेशनशीप में रहते हो और कोई और नई लड़की आपको मिल जाती है तो आप ब्रेकअप कर के आगे बढ़ जाते हो, लड़की भी थोड़-बहुत रो- गाकर चुप हो जाती है लेकिन कोई लड़की जब आपको छोड़ के आगे बढ़ना चाहती है आपका इगो हर्ट हो जाता है, और आप हर हाल में उसे सबक सिखाना चाहते हो, बदला लेना चाहते हो।  क्या आपका इगो किसी लड़की के जान से भी बढ़ कर है कि उसे सबक सिखाने के लिए आप किसी भी हद तक जाने से नहीं चूकते और फिर कहते हैं कि ये प्यार है।

ऐसा नहीं है कि लड़कियाँ भी सब ठीक ही हैं लेकिन बदला लेने के लिए किसी भी हद तक गिरने वाली बात कम से कम उनके अंदर उतनी नहीं है। अक्सर पुलिस,प्रशासन, समाज, परिवार सब लड़कियों के साथ होने वाली ऐसी घटनाओं के लिए उसे ही जिम्मेदार ठहरा देते हैं कि लड़कों से दोस्ती ही क्यों करती हो, लड़कों के साथ घूमती ही क्यों हो, उनसे बात ही क्यों करती हो, क्या इस समस्या का ये समाधान है कि हम एक प्रगतिशील होते समाज को  फिर से उसी स्तर पर ले जाए जहाँ पुरूष को देखकर महिलाएँ घूंघट कर लें और अपना रास्ता बदल लें ऐसी कल्पना से ही डर लगने लगता है।
इस समाज का निर्माण हमारे हाथ में है और हमें ही सोचना होगा कि हमें इसे किस दिशा में ले जाना है, पुलिस को चाहिए ऐसी किसी भी वारदात में दोषी लड़के पर त्वरित और जल्दी कारवाई हो, परिवार लड़की के साथ मजबूती से खड़े हो और उसे ही कसूरवार ना माने, लड़के के परिवार और दोस्तों को चाहिए कि उसे एहसास दिलाए कि हर इंसान को उसकी मर्जी से जीने का हक है। हम में से हर एक को इस बात को समझना होगा और अगर नहीं समझना तो फिर कितना भी शराब, बाल-विवाह, दहेज आदि कुछ भी रोक दो रसातल में जा रहे इस समाज को नहीं रोक सकते।

(अभिषेक)


Wednesday, 13 December 2017

इस देश की जमीन केवल उद्दोगपतियों की है और गरीबों के लिए फुटपाथ भी नहीं है......


टूट कर गिरा हुआ छप्पर, गिरी हुई बांस की बल्लियां, बुझा और टूटा हुआ चूल्हा, मरघट सा सन्नाटा और उसके पास आँखों में पानी और जाने कितने सवाल लिए खड़ा चायवाला जाने किस सोच में गुम था। आज वापस घर जाते हुए हुए उसके पास बिके हुए चाय और सिगरेट का हिसाब नहीं होगा,कल सुबह जल्दी जगने की हड़बड़ी नहीं होगी, जब उसे उदास देख बीबी उससे सवाल करेगी तो उन सवालों का सामना वो कैसे करेगा, कुछ ही देर में ऐसे जाने कितने सवाल मैंने उसकी आँखों में पढ़ लिए।

ऑफिस के सामने होने के कारण यह हमारे चाय का अड्डा हुआ करता है जहाँ बैठ के चाय पीते हुए जाने कितने क्रिएटिव आइडियाज हमारे दिमाग में आते हैं, कुछ अलग मीडिया हाउस से भी चाय के शौकिन मित्र यहाँ आते रहते हैं इसलिए हमारे लिए यहीं जगह चिलआउट का प्रॉपर प्लेस भी है, कोई बाहर से भी मिलने आता है तो उसे भी यही कहते हैं कि चाय की दुकान पर बैठो चाय बनवाओ हम आते हैं इसलिए भी इस जगह से एक इमोशनल कनेक्ट बना हुआ है।

आज जब उजड़े हुए इस चाय के दुकान को देखा तो लगा जैसे मेरा घर उजड़ गया है, अजीब सा लग रहा था, काफी देर मैं वहीं खड़ा रहा एक- एक कर के चायवाले को सामान बटोरते देखता रहा पूछा कि क्या हुआ तो उन्होंने कहा कि जेसीबी लेकर आए थे सब उजाड़ के चले गए। मैंने कहा क्यों तो बताया कि ये थोड़े कोई बताता है अचानक आता है ऐसे ही उजाड़ के चला जाता है।

मैं सोचने लगा कि क्या इस देश की जमीन केवल उद्दोगपतियों की है और सरकार जिसे मन करे उसे अपने हिसाब से एलॉट कर देती हैं क्या गरीबों के लिए फुटपाथ भी नहीं है जहाँ ये अपनी जीविका चलाने भर कुछ कमाई कर सके। अगर नियम है तो केवल इनके लिए क्यों है उन मॉल्स के लिए क्यों नहीं है जो अपनी जमीन पर तो मॉल बना लेते हैं बाकि वहां आने वाली गाड़ियाँ सड़कों पर पार्क होती हैं। सड़क पर या फुटपाथ पर दुकान लगाना गलत है लेकिन फिर अपनी जीविका चलाने के लिए ये कहाँ जाएं। शहर के बाहर जाकर चाय की टपरी नहीं ना लगाएंगे।

हर बार चुनावों में यही सुनता हूँ गरीबों का कल्याण करने वाली, गरीबी दूर हटाने वाली, गरीबों की सरकार ये अलग बात है कि गरीबी के बदले गरीबों को ही ये दूर भगाने लगती है। हर बार हम मोहरों की तरह वोट देने के लिए इस्तेमाल किए जाते हैं, हर बार गरीब कह के हमें ही लूटा जाता है, हमारे ही वोट से ये वीआईपी हो जाते हैं और हम वैसे के वैसे। जो आपके द्वार पर आकर खुद को गरीबों का बेटा, चायवाला बताकर आपसे वोट ले जाता है जीतते ही उसे आपसे घिन आने लगती है। वो शासक बन जाता है और आपके लिए दरबार लगाता है और इसे अपनी शान समझता है, आप अपने मन से चाहें तो उसे मिल नहीं सकते। वो  जीत कर शहर को स्वच्छ बनाने के लिए आपके चाय के टपरे को उजड़वा देता है।
इस स्मार्ट होते शहर में ये चाय के टपरे, सब्जी वाले, ठेले वाले सब बदनुमा दाग की तरह लगने लगते हैं जिन्हें उजाड़ना हर सरकार को जरूरी लगता है क्योंकि स्मार्ट शहर में हर चीज मॉल में बिकती हुई ही सुंदर लगती है।

(अभिषेक)





Tuesday, 21 November 2017

एक स्वघोषित, स्वनामधन्य सेना के सुयोग्य, कर्मठ और जुझारू कार्यकर्ता से बातचीत.........


प.- जी पद्मावती.......

और पद्मावती का नाम सुनते ही उसकी भुजाएं फड़कने लगी, आँखों से अंगारे निकलने लगे, चेहरा बिल्कुल ड्रैगन की तरह नजर आने लगा, मैंने पूछा भाई क्या हुआ तो उसने मुंह से आग की लपटें निकालते हुए कहा तुझे पता नहीं मैं एक स्वघोषित सेना में बतौर मीडिया सलाहकार काम करता हूँ और मेरा काम ही यही है कि किसी भी हालत में किसी की जुबान से श्री श्री 1008 परमपूजनिया राजमाता पद्मावती जी का नाम नहीं निकलना चाहिए। अरे पापी, नीच, नराधम जिस ने अपने देश के लिए जान दे दी उनका नाम तु अपनी गंदी जुबान से लेता है तुझे शर्म नहीं आती.....


प.- मैंने कहा भाई मैंने तो नाम ही लिया बस....कुछ कहा तो नहीं अभी....

उसने कहा कि नाम भी नहीं ले सकते इस नाम पर ही करणी सेना ने कॉपीराइट करा रखा है जैसे तुम नाम लोगे हम आगे की सारी बातें समझ जाएंगे और पुरूष वर्ग की जुबान और स्त्री वर्ग के लिए नाक काटने का फतवा जारी कर देंगे। इतना ही नहीं हमारी सेना का एक भाग सोशल मीडिया पर बस इसलिए सक्रीय है कि तुम जैसों के फेसबुक, ट्वीटर का प्रोफाइल ढ़ूंढ़ कर तुम्हें ट्रोल कर सके।


प.- भाई लेकिन मैंने तो पढ़ा है कि फिल्म के पहले लिखा होता है इस कहानी के पात्र और घटनाएं काल्पनिक हैं...

पात्र नहीं कुपात्र हैं ये....ये सब मिल के देश का इतिहास बदलना चाहते हैं लेकिन इन्हें पता नहीं है कि हम इनका भविष्य और शारीरिक भूगोल बदल देंगे। याद है ना पिछले साल पड़ाका बजाया था गाल पर, लगता है गूंज भूल गए इतनी जल्दी इसलिए हमलोगों धमकियों का लेवल बढ़ा दिया है इनलोगों को मारने के लिए इनाम का भी ऑप्शन लेकर आए हैं।


प.- भविष्य को लेकर आपकी क्या योजनाएं हैं

देखिए....भविष्य हमारा घनघोर रूप से सुरक्षित है....देश बाद में सुरक्षित होगा पहले हमें इसका इतिहास सुरक्षित करना है...और अपने भविष्य के लिए हमलोग चुनाव लड़ेंगे और इस देश की बौड़म जनता पर हमें पूरा भरोसा है कि हमें जिताएगी भी....और आपका जैसे कि भरपूर मनोरंजन हम लगातार कर रहे हैं आगे भी करते रहेंगे...भंसाली जी को भी हम धन्यवाद देना चाहते हैं जिन्होंने अपने माध्यम से हमें अपनी प्रतिभा को निखारने का अवसर प्रदान किया.....और चलिए अब बहुत सवाल जवाब हो गया अब आगे कुछ भी पूछे तो मुंह से नहीं तलवार से बात होगी....तो फौरन निकल लो......जय हो महारानी की....और सुनो, जयकारा लगाए बिना मत जाना.....
प.- जी सर.... जय हो महारानी की........


(अभिषेक)

Tuesday, 17 October 2017

कहीं दिवाली के दीये सज रहे हैं
तो कहीं भूख से बच्चे मर रहे हैं
सुबह ऑफिस आने का बाद जो नेट पर पहली न्यूज पढ़ी तो दिमाग के कई सवाल आए, ये अलग बात है कि इस सरकार में सवाल करने की आदत धीरे धीरे कम होती जा रही है फिर भी जरूरत पड़ने पर अपनी बात कहने से कभी पीछे नहीं हटता।
तो खबर थी कि झारखंड में भूख से एक बच्ची की मौत हो गई, बच्ची की माँ ने बताया कि आधार से लिंक नहीं होने की वजह से उसे राशन नहीं मिला जिससे घर में खाना नहीं बन पाया, स्कूल बंद होने की वजह से मीड डे मिल का भी ऑप्शन नहीं था और बच्ची ने भात-भात कहते हुए आँखें मूंद ली।
सबसे पहले मुझे सच में  ये विश्वास नहीं हुआ कि सच में इस युग में भी भूख के कारण किसी की जान जा सकती है, ये अलग बात है कि कल वर्ल्ड भूड डे था और विश्व में सबसे भूखे देशों की लिस्ट में हम काफी आगे हैं लेकिन इसका ये मतलब तो नहीं कि हमारे देश में आज भी लोग भूखे मरते हैं। अरे हमारे यहाँ लाखों की संख्या में काम करने वाले एनजीओ हैं, कई ऐसे लोग हैं जो दिवाली में अपने संस्थान के खुद के माध्यम से खुशियाँ बांटने का काम कर रहे हैं और स्लम्स में जा कर दिवाली मना रहे हैं ऐसे में इस बच्ची का मरना इनके लिए काम करने वालों पर सवाल खड़ा करता है।
इसके अलावा क्या केवल आधार का राशन से लिंक ना होना उसकी मौत के लिए जिम्मेदार है कहना मुझे उचित नहीं लगता, अगर कोई आपके आस पास भूख से तड़प रहा है तो उससे ये थोड़े ना पूछते हैं कि तुम्हें खाना क्यों नहीं मिला, क्या तुम्हारा आधार से राशन लिंक नहीं हुआ है, ये सब सेकेंण्डरी बातें हैं प्राथमिक है उसे भोजन उपलब्ध कराना जो ना हो सका।
इस बच्ची की मौत हमारे आगे बढ़ते और प्रगतिशील होते समाज पर कलंक है, रोज फेसबुक पर कई प्रकार के ज्ञान मिलते हैं, कुछ आलोचना कर दो तो लोग कहते हैं आप देश की आलोचना कैसे कर सकते हैं, और आलोचना देश की नहीं यहाँ के व्यवस्था की है जिसमें आज भी भूख से बच्चे मर जाते हैं कैसे मानूं मैं कि देश आगे बढ़ रहा है। तमाम योजनाएं और घोषणाओं का क्या फायदा जब भूख से तड़प के मरने को विवश हैं लोग।
मुझे भी पता है कि मेरे लिखने से कुछ ऐसा बदलने वाला नहीं है लेकिन मन विचलित जरूर है और परेशान भी कि इस मौत का जिम्मेदार कौन है जुमलेबाजी करने वाली सरकार, आधार से राशन को लिंक करने की योजना, वो राशन की दुकान वाला जिसने उस बच्ची के भूख को नहीं नहीं आधार का राशन से लिंक होना जरूरी समझा, वो तमाम संस्थाएं जो गरीबों को भोजन कराने का दावा करती हैं या मैं और आप जिन्हें इससे फर्क नहीं पड़ता कि अभी भी आपके बगल में कोई भूखा सो रहा है??

(अभिषेक)